Monday, January 2, 2017

👉 दूसरे की गलती

👉 दूसरे की गलती



🔵 एक बार गुरू आत्मानंद ने अपने चार शिष्यों को एक पाठ पढाया। पाठ पढाने के बाद वह अपने शिष्यों से बोले- “अब तुम चारों इस पाठ का स्वाध्ययन कर इसे याद करो। इस बीच यह ध्यान रखना कि तुममें से कोई बोले नहीं। एक घंटे बाद मै तुमसे इस पाठ के बारे में बात करुँगा।“

🔴 यह कह कर गुरू आत्मानंद वहाँ से चले गए। उनके जाने के बाद चारों शिष्य बैठ कर पाठ का अध्ययन करने लगे। अचानक बादल घिर आए और वर्षा की संभावना दिखने लगी।

🔵 यह देख कर एक शिष्य बोला- “लगता है तेज बारिश होगी।“

🔴 ये सुन कर दूसरा शिष्य बोला- “तुम्हें बोलना नहीं चाहिये था। गुरू जी ने मना किया था। तुमने गुरू जी की आज्ञा भंग कर दी।“

🔵 तभी तीसरा शिष्य भी बोल पडा- “तुम भी तो बोल रहे हो।“

🔴 इस तरह तीन शिष्य बोल पडे, अब सिर्फ चौथा शिष्य बचा वो कुछ भी न बोला। चुपचाप पढता रहा।

🔵 एक घंटे बाद गुरू जी लौट आए। उन्हें देखते ही एक शिष्य बोला- “गुरूजी! यह मौन नहीं रहा, बोल दिया।“

🔴 दुसरा बोला- “तो तुम कहाँ मौन थे, तुम भी तो बोले थे।“

🔵 तीसरा बोला- “इन दोनो ने बोलकर आपकी आज्ञा भंग कर दी।“

🔴 ये सुन पहले वाले दोनो फिर बोले- “तो तुम कौन सा मौन थे, तुम भी तो हमारे साथ बोले थे।“

🔵 चौथा शिष्य अब भी चुप था।

🔴 यह देख गुरू जी बोले- “मतलब तो ये हुवा कि तुम तीनो ही बोल पडे। बस ये चौथा शिष्य ही चुप रहा। अर्थात सिर्फ इसी ने मेरी शिक्षा ग्रहण की और मेरी बात का अनुसरण किया। यह निश्चय ही आगे योग्य आदमी बनेगा। परंतु तुम तीनो पर मुझे संदेह है। एक तो तुम तीनों ने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया; और वह भी एक-दूसरे की गलती बताने के लिये। और ऐसा करने में तुम सबों ने स्वयं की गलती पर ध्यान न दिया।

🔵 आमतौर पर सभी लोग ऐसा ही करते हैं। दूसरों को गलत बताने और साबित करने की कोशिश में स्वयं कब गलती कर बैठते हैं। उन्हें इसका एहसास भी नहीं होता। यह सुनकर तीनो शिष्य लज्जित हो गये। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की, गुरू जी से क्षमा माँगी और स्वयं को सुधारने का वचन दिया।

Friday, December 30, 2016

दुनीचन्द का पिता लक्कड़बग्घे के रूप में

दुनीचन्द का पिता लक्कड़बग्घे के रूप में
एक बार श्री गुरुनानकदेव जी भ्रमण करते हुये एक गांव में पहुँचे। वहाँ दूनीचन्द नाम का एक अत्यन्त धनाढ¬ व्यक्ति रहता था,जो उस ज़माने में सात लाख रुपये का स्वामी था। जिस दिन श्री गुरुनानकदेव जी उस के गाँव में पहुँचे,उस दिन दूनीचन्द अपने पिता की याद में श्राद्ध कर रहा था। श्री गुरुनानकदेव जी के शुभागमन का समाचार सुनकर वह उनके चरणों में उपस्थित हुआ और विनय कर अत्यन्त सम्मान से उन्हें अपने घर ले गया।जब उसने अनेक प्रकार के व्यंजन उनके सामने परोसे, तो उन्होने दुनीचन्द से पूछा-आज तुम्हारे घर क्या है?दूनीचन्द ने विनय की-आज मेरे पिता का श्राद्ध है। उनके निमित्त आज मैने सौ ब्रााहृणों को खाना खिलाया है। अन्तर्यामी श्री गुरुनानकदेव जी ने फरमाया-दूनीचन्द! तुम्हारे पिता कोआज तीन दिन से भोजन प्राप्त नहीं हुआ।वह भूखा बैठा है और तुम कहते हो कि उसके निमित्त तुमने सौ ब्रााहृणों को खाना खिलाया है। दूनीचन्द ने पूछा-मेरे पिता इस समय कहाँ हैं?
     श्री गुरुनानक देव जी ने फरमाया-यहाँ से पचास कोस की दूरी पर अमुक स्थान पर एक बघियाड़ के रूप में तुम्हारे पिता बैठे हैं। तुम वहाँ प्रसाद लेकर जाओ,परन्तु डरना नहीं।तुम्हारे वहाँ जाने से उसकी मनुष्य-बुद्धि हो जायेगीऔर वह प्रसाद खा लेगा। दुनीचन्द ने वहाँ पहुँचकर देखा कि एक लकड़बग्घा एक पेड़ के नीचे बैठा है।वह उसके निकट चला गया,प्रसादआगे रखा और प्रणाम कर कहा-पिता जी!आपके निमित्त मैने आज सौ ब्रााहृणों को खाना खिलाया है।सत्पुरुषों की कृपा से लकड़बग्घे की मनुष्य-बुद्धि हो गई। तब दुनीचन्द ने कहा-पिता जी! लकड़बग्घे की देहआपने क्यों पाई?उसने उत्तर दिया-""मेरी यह दशा इसलिए हुई,क्योंकि मैने किसी पूर्ण सतगुरु की शरण ग्रहण नहीं की थी,जिससे मन तथा मन के विकारों के अधीन होकर मैने जीवन बिताया।जब मेरा अन्तिम समय निकटआया,उस समय मेरे घर के निकट ही किसी ने गोश्त पकाया,जिस की गन्ध मुझ तक पहुँचीऔर मेरे मन में गोश्त खाने की इच्छा पैदा हुई। अन्तिम समय की उस वासना के अनुसार ही मुझे यह योनि मिली। इसलिये तुमको चाहिये कि पूर्णगुरु की शरणग्रहण कर उनके पवित्र शब्द की कमाई करो ताकिअन्त समय तुम्हारा ध्यान मालिक की ओर लगा रहे और तुम्हारा जन्म सँवर जाये।'' यह कहकर उसने प्रसाद खा लिया। दुनीचन्द घर वापस आया और श्री गुरुनानकदेव जी के चरणों में समस्त वृत्तान्त कह सुनाया। और उनका शिष्य हो गया।
          देह छुटै मन में रहै, सहजो जैसी आस।
          देह जन्म तैसो मिलै, तैसे ही घर बास।।

Friday, December 2, 2016

आस्तिक और एक नास्तिक

एक आस्तिक और एक नास्तिक मनुष्य में वाद विवाद चल रहा था। नास्तिक कहता था कि ईश्वर अथवा मालिक के नाम का कोई भी अस्तित्व संसार में नहीं है। आस्तिक बोला,"" नहीं भाई! यह संसार की रचनाऔर इसका प्रबन्ध यों ही तो नहीं हो गया।जिस शक्ति अथवा सत्ता के आधार पर यह सब रचनाऔर इसका प्रबन्ध होता है,तुम उस मालिक के अस्तित्व को मानने से इनकार किस तरह करते हो?''नास्तिक बोला ""यदि तुम्हारे कथनानुसार कोई ईश्वर है मालिक है, तो वह हमें दिखाई क्यों नहीं देता? बोलो,यदि तुम मुझे उस ईश्वर अथवा मालिक को दिखा तो,तब तो मैं विश्वास कर सकता हूँ अन्यथा नहीं।''इस बात को सुनकर आस्तिक ने उसे समझाया कि ईश्वर का रूप सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है। वह इन ज़ाहिरी आँखों से नहीं देखा जा सकता। किन्तु नास्तिक किसी प्रकार से भी मानने को तैयार न हुआ। तब आस्तिक पुरुष ने उठकर ज़ोर से एक घूंसा उस नास्तिक की कमर में दे मारा।घूँसा लगने से वह नास्तिक चिल्ला उठा,""वाह भाई वा!यह भी खूब रही।जब तुमसे कोई बात न बन सकी, तो अब हाथापाई के ओछेपन पर उतर आये हो?''आस्तिक पुरुष ने उत्तर दिया-""नहीं भाई साहिब!मेरा यह मतलब हरगिज़ नहीं। मैं तो तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे रहा हूँ। अच्छा, तुम ही बताओ कि तुम रोते-चिल्लाते क्यों हो?''
   नास्तिक बोला-""वाह!रोने-चिल्लाने की तो बात ही है तुम्हारा घूँसे से कमर में इतना दर्द हो रहा है, कि कुछ कहा ही नहीं जाता।''आस्तिक ने कहा-""अच्छा, तो तुम दर्द से चिल्ला रहे हो। किन्तु भाई!मुझे तो तुम्हारा
यह दर्द कहीं भी दिखाई नहीं देता। हाँ,ज़रा दिखाओ तो, दर्द कैसा है?'' नास्तिक ने कहा,""अरे तुम भी खूब हो,भला कहीं दर्द भी दिखाई दे सकता है,जो मैं तुम्हें दिखा दूँ?''आस्तिक ने कहा,""बस, तो फिर तुम्हारे इतराज़ का जवाब तुम्हें मिल चुका। जिस तरह दर्द या तकलीफ अनुभव होते हैं,किन्तु देखे नहीं जा सकते, इसी तरह ही ईश्वर अथवा मालिक भी अनुभव के द्वारा जाना जा सकता है। परन्तु इन स्थूलआँखों से उसे देखा नहीं जा सकता।आस्तिक पुरुष का यह उत्तर सुनकर नास्तिक लज्ज़ित हुआ और उसे मालिक के अस्तित्व का विश्वास आ गया।

Friday, November 18, 2016

मन्त्रियों के रोकने पर भी राजा दान करता था

मन्त्रियों के रोकने पर भी राजा दान करता था
     एक राजा को किसी महात्मा ने यह उपदेश किया कि जब तक तुम्हारे हाथ में धन है,तब तक भलाई और परमार्थ के काम किये जाओ। वह राजा विचारवान और श्रद्धालु था। उसने महात्मा जी की बात गाँठ बाँध ली और अनेक स्थानों पर सत्संग एवं भजनाभ्यास के लिये आश्रम बनवाने आरम्भ कर दिये और साधु-महात्माओं के लिये लंगर तथाअन्य प्रकार की सेवा आदि का प्रबन्ध भी कर दिया।
     राजा के मंत्री आदि सांसारिक विचार रखने वाले थे। उनको राजा की यह उदारता एक आँख न भाती थी,अतएव वे सब के सब मिलकर एक साथ राजा को इन कामों से मना करने लगे और यह भी कहा कि राजकाज में और भी सहरुाों प्रकार कीआवश्यकतायें सामने आती रहती हैं,इसलिये राजकोष को इसप्रकार व्यर्थ के कार्यों में लुटाना उचित नहीं।चूँकि राजा दृढ़ निश्चय वाला था,इसलिये वहअपने मार्ग से तनिक भी न डगमगाया।इधर मंत्री भी चुप करके न बैठेऔर बार-बार राजा के कान भरते रहे।अन्त में राजा ने तंग आकर यहआदेश जारी कर दिया कि जो भी मुझे इन धार्मिक कामों में धन व्यय करने से रोकेगा,मैं उसकी जीभ कटवा दूंगा।भय के कारण मंत्री मुखसे कहने से तो रुक गये,परन्तुउनके मन को यह बात सहन नहीं हुई, इसलिये उन्होने एक दिन राजप्रासाद की दीवार पर ये शब्द लिख दिये-""माल जमा कुन ता अज़ खतरा निजात याबी''अर्थात यदि संकटों से बचना चाहते हो तो धन का संचय करो। राजा ने जब ये शब्द पढ़े तो समझ गया कि मंत्री मुझे धन व्यय करने से रोकना चाहते हैं। उसने उन शब्दों के नीचे ये शब्द लिखवा दिये,"'निको कारान रा खतरा व खौफ नेस्त।''अर्थात भलाई के काम करने वालों को किसी प्रकार के संकट एवं भय का सामना नहीं करना पड़ता।मंत्रियों ने देखा कि राजा ने हमारे परामर्श को रद्द कर दिया, फिर भी उन्होने एक बार और उसके नीचे लिखवा दिया,""इन्सान गाह बगाह आमाजगाहे-मुसीबत में शवद'' अर्थात् मनुष्य कभी-कभी संकट का निशाना बन ही जाता है। राजा समझ गया कि उनका संकेत है कि कभी-कभी मनुष्य को संकटों का सामना करना पड़ता है जैसे श्री रामचन्द्र जी महाराज एवं युधिष्ठिर आदि पर भी संकट आये। किन्तु इन अज्ञानियों को यह पता नहीं कि संचित किया हुआ धन संकटों के आने से पूर्व ही मनुष्य का साथ छोड़ जाता है। यह विचार करके राजा ने उसके नीचे लिखवा दिया,""जमा करदा मालो-ज़र किबल अज मुसीबत ज़ाय में शवद''अर्थात् संचित किया हुआ धन संकटों के आने के पूर्व ही नष्ट हो जाता है।
    मंत्रियों ने भली प्रकारआज़मा कर देख लिया कि राजाअपने निश्चय पर अडिग है,अब यदि अधिक छेड़छाड़ करेंगे तो राजा के क्रोध से बच नहीं सकेंगे,इसलिये सब के सब शान्त होकर बैठ गयेऔर राजा नेअपना सम्पूर्ण जीवन सन्त-महात्माओं की सेवा और सत्संग में रहकर सुख-आनन्द से व्यतीत किया तथा इस लोक में भी ख्याति प्राप्त की और परलोक भी संवार लिया। इस कथा से सिद्ध होता है कि दृढ़ संकल्प में इतनी महान शक्ति है जो दृढ़ निश्चय से भक्तिमार्ग पर चल पड़ता है, वह अपना लोक-परलोक सुगमता से संवार लेता है।

Saturday, November 12, 2016

असीमित पुण्य



एक बार गुजरात की एक रियासत की राजमाता मीलण देवी ने भगवान सोमनाथ जी का विधिवत् अभिषेक किया। उन्होंने सोने का तुलादान कर उसे सोमनाथ जी को अर्पित कर दिया। सोने का तुलादान कर उनके मन में अहंकार भर गया और वह सोचने लगीं कि आज तक किसी ने भी इस तरह भगवान का तुलादान नहीं किया होगा। इसके बाद वह अपने महल में आ गईं। रात में उन्हें भगवान सोमनाथ के दर्शन हुए। भगवान ने उनसे कहा, ‘मेरे मंदिर में एक गरीब महिला दर्शन के लिए आई है। उसके संचित पुण्य असीमित हैं। उनमें से कुछ पुण्य तुम उसे सोने की मुद्राएं देकर खरीद लो। परलोक में काम आएंगे।’

नींद टूटते ही राजमाता बेचैन हो गईं। उन्होंने अपने कर्मचारियों को मंदिर से उस महिला को राजभवन लाने के लिए कहा। कर्मचारी मंदिर पहुंचे और वहां से उस महिला को पकड़ कर ले आए।
गरीब महिला थर-थर कांप रही थी। राजमाता ने उस गरीब महिला से कहा, ‘मुझे अपने संचित पुण्य दे दो, बदले में मैं तुम्हें सोने की मुद्रएं दूंगी।’ राजमाता की बात सुनकर वह महिला बोली, ‘महारानी जी, मुझ गरीब से भला पुण्य कार्य कैसे हो सकते हैं। मैं तो खुद दर-दर भीख मांगती हूं। भीख में मिले चने चबाते-चबाते मैं तीर्थयात्रा को निकली थी।

कल मंदिर में दर्शन करने से पहले एक मुट्ठी सत्तू मुझे किसी ने दिए थे। उसमें से आधे सत्तू से मैंने भगवान सोमेश्वर को भोग लगाया तथा बाकी सत्तू एक भूखे भिखारी को खिला दिया। जब मैं भगवान को ठीक ढंग से प्रसाद ही नहीं चढ़ा पाई तो मुझे पुण्य कहां से मिलेगा?’ गरीब महिला की बात सुनकर राजमाता का अहंकार नष्ट हो गया। वह समझ गईं कि नि:स्वार्थ समर्पण की भावना से प्रसन्न होकर ही भगवान सोमेश्वर ने उस महिला को असीमित पुण्य प्रदान किए हैं। इसके बाद राजमाता ने अहंकार त्याग दिया और मानव सेवा को ही अपना सवोर्परि धर्म बना लिया ।

Tuesday, November 8, 2016

आयु कुल चार वर्ष


     नौशेरवाँ को जो भी मिले, उसी से कुछ न कुछ सीखने का स्वभाव हो गया था। अपने इस गुण के कारण ही उन्होंने अपने जीवन के स्वल्प काल में ही महत्वपूर्ण अनुभव अर्जित कर लिये थे। राजा नौशेरवाँ एक दिन वेष बदलकर कहीं जा रहे थे। मार्ग में उन्हें एक वृद्ध किसान मिला। किसान के बाल पक गए थे, पर शरीर में जवानों जैसी चेतनता विद्यमान थी। उसका रहस्य जानने की इच्छा से नौशेरवाँ ने पूछा, "महानुभाव! आपकी आयु कितनी होगी?'
     वृद्ध ने मुस्कान भरी दृष्टि नौशेरवां पर डाली और हँसते हुए उत्तर दिया," कुल चार वर्ष।' नौशेरवाँ ने सोचा बूढ़ा दिल्लगी कर रहा है। पर सच-सच पूछने पर भी जब उसने चार वर्ष ही आयु बताई, तो उन्हें कुछ क्रोध आ गया। एक बार तो मन में आया कि उसे बता दूँ- मैं साधारण व्यक्ति नहीं, नौशेरवाँ हूँ, पर उन्होंने विवेक को संभाला और विचार किया कि उत्तेजित हो उठने वाले व्यक्ति सच्चे जिज्ञासु नहीं हो सकते, किसी के ज्ञान का लाभ नहीं ले सकते, इसलिए उठे हुए क्रोध का उफान वहीं शांत हो गया।
     अब नौशेरवां ने नये सिरे से पूछा-' पितामह! आपके बाल पक गए, शरीर में झुरियाँ पड़ गर्इं, लाठी लेकर चलते हैं, मेरा अनुमान है कि आप अस्सी से कम के न होंगे, फिर आप अपने को चार वर्ष का कैसे बताते हैं?' वृद्ध ने इस बार गम्भीर होकर कहा-आप ठीक कहते हैं, मेरी आयु अस्सी वर्ष की है, किन्तु मैने छियत्तर वर्ष धन कमाने, ब्याह-शादी और बच्चे पैदा करने में बिताए। ऐसा जीवन तो कोई पशु भी जी सकता है। इसलिए उसे मैं मनुष्य की अपनी ज़िन्दगी नहीं, किसी पशु की ज़िन्दगी मानता हूँ। इधर चार वर्ष से समझ आई। अब मेरा मन ईश्वर उपासना, जप, तप, सेवा, सदाचार, दया करुणा, उदारता में लग रहा है। इसलिए मैं अपने को चार वर्ष का ही मानता हूँ।' नौशेरवाँ वृद्ध का उत्तर सुनकर संतुष्ट हुए और प्रसन्नता पूर्वक अपने राजमहल लौटकर सादगी, सेवा और सज्जनता का जीवन जीने लगे।

Thursday, November 3, 2016

नामदेव-त्रिलोचन संवाद


          कर से कर्म करो विधि नाना
          मन में राखो कृपानिधाना।।
अर्थात् हाथ-पाँव से बेशक संसार के कार्यव्यवहार करो,परन्तु ह्मदय में परमेश्वर का सुमिरण-चिंतन हर समय बना रहे, सुरत हर समय नाम में जुड़ी रहे। सन्त नामदेव जी जाति के सींपी (दर्ज़ी) थे। कपड़ों पर कढ़ाई (बेल बूटे बनाने) का काम करते थे। जीवन निर्वाह के लिये जैसे सन्त श्री कबीर साहिब जी कपड़ा बुनने का और सन्त रविदास जी जूते गाँठने का काम करते थे,उसी प्रकार सन्त नामदेव जी कपड़े सीने का और उन पर कढ़ाई करने का कार्य करते थे।परन्तु कामकाज करते हुए भीउनकी सुरत सदा परमात्मा के सुमिरण ध्यान में जुड़ी रहती थी।
     एक दिन भक्त त्रिलोचन जी सन्त नामदेव जी से मिलने उनके घर गये। भक्त त्रिलोचन जी भी बड़े उच्चकोटि के भक्त थे, परन्तु वे कोई कामकाज नहीं करते थे।भक्त त्रिलोचन जी जब सन्त नामदेव जी के घर
पर पहुँचे तो उस समय उस समय वे कपड़ों पर कढ़ाई करने में व्यस्त थे,अतः भक्त त्रिलोचन जी के आने का उन्हें पता नहीं चला जिससे भक्त त्रिलोचन जी ने अपने मन में अभी तक यह सोच रखा था कि सन्त नामदेव जी संसार के कार्यों से विरक्त होकर सदा सुमिरणभजन में लीन रहते होंगे,परन्तु उन्हें कपड़े छापने में व्यस्त देखर त्रिलोचन जी मन में विचार करके लगे कि ये तो अभी तक सांसारिक कार्य-व्यवहार में ही आसक्त हैं, इनका मन प्रभु के सुमिरण में क्या लगता होगा? उन्होंने उस समय यह वाणी पढ़ी--
          नामा माइआ मोहिआ कहै तिलोचनु मीत।।
          काहे छीपहु छाइलै राम न  लावहु चीत।।
    त्रिलोचन जी ने कहा कि हे नामदेव जी! तुम्हें तो माया ने मोह रखा है। तुम यह कपड़ों की कढ़ाई का काम किसलिए कर रहे हो? परमात्मा के साथ चित्त का सम्बन्ध क्यों नहीं जोड़ते? यह सुनकर सन्त नामदेव जी ने उत्तर दिया--
          नामा कहै तिलोचना मुख  ते  राम  संभालि।।
          हाथ पाउ करि कामु सभु चीतु निरंजन नालि।।
  हे त्रिलोचन!नामदेव का यह कहना है कि मुख से हर समय प्रभु-नाम की संभाल कर अर्थात हर समय नाम का सुमिरण कर। हाथ-पाँव आदि से बेशक संसार के सब काम कर,परन्तु तुम्हारा चित्त सदा परमात्मा के साथ जुड़ा रहे।

Sunday, October 30, 2016

शमशान ही बस्ती है

शमशान ही बस्ती है
   एक व्यक्ति किसी गाँव में पहुँच जाना चाहता था।जाने कितनी देर से चल रहा था वह पर मन्जिल जैसे दूर दूर भाग रही थी। सूर्य प्रतिपल अस्ताचल की ओर सरकता जा रहा था। जंगल के वह सुनसान एवं अन्जान रास्ते पर से गुजरते हुए बड़ा चिन्तित था और अंधेरा घिरने से पहले  किसी गाँव तक सकुशल पहुँच जाना चाहता था। तभी आगे जंगल में मन्दिरनुमा खण्डहर के सामने बैठे एक साधु को देखकर उसके चिंतित मन को थोड़ा ढाढस बंधा। साधु के समीप जाकर प्रणाम कर उसने सानुरोध पूछा-महात्मन।मैं एक पथिक हूँ।इधर के रास्ते सेअनजान हूँ, विश्रांति के लिये रात्रि होने से पहले किसी बस्ती तक पहुँच जाना चाहता हूँ,क्या आप बता सकते हैं, इधर पास में कोई बस्ती है?साधु ने पथिक की ओर देखा। फिर उसे इशारा से उधर का रास्ता बता दिया जिधर कुछ दूरी पर एक जगह से धुआँ उठ रहा था। पथिक उस जगह भागा भागा जा पहुँचा,किन्तु तत्काल साधु के पास पुनः लौट आयाऔर शिकायत भरे लहजे में तनिक रोष भरे स्वर में बोला।यह क्या महात्मन् मैने आपसे  बस्ती  का  रास्ता पूछा था, किन्तु आपने मुझे श्मशान का रास्ता बता दिया।उसकी बात सुनकर साधुअनायास अट्टहास कर उठा। पथिक ने इसेअपनाअपमान समझा।और नाराज़गी भरे स्वर में कहा-एक तो आपने मुझे गलत रास्ता बताया और ऊपर से मेरी बातों का मज़ाक बनाकर मेरा उपहास उड़ा रहे हैं। साधु उसकी नाराज़गी पर ज़रा भी असंयमित नहीं हुआ। वह संयत स्वर में बोला-वत्स। मुझे तुम्हारी विवशता पर नही बल्कि तुम्हारीअल्प बुद्धि पर हँसी आ गई थी। गलती पर मैं नहीं,बल्कि तुम हो।तुम्हारी तरह प्रत्येक संसारी यह गलती करता है। वस्तुतः तुम जिसे श्मशान समझ रहे हो,वही असली बस्ती है और जिसे तुम बस्ती समझते हो वह बस्ती नहीं, बल्कि एक सराय मात्र है, जहाँ तुम जैसे संसारी लोग दुख-सुख अपने पराए, पिता-पुत्र,पति पत्नि, बन्धु बान्धव आदि जैसे नाना भाँति के मायारूपी गृह जंजालों में उलझते सुलझते यात्रियों की भाँति आते हैं,सराय में कुछ दिनों तक निवास करते हैं और फिर एक दिन उसी श्माशन रूपी बस्ती में हमेंशा के लिये जा बसते हैं।आप जिसे बस्ती कहते हैं वहाँ से आकर उन्हें यहाँ बसते हुए हमने कई बर्षों से देखा है यहाँ से वहाँ जाते हुए किसी को नहीं देखा। तुम्ही बताओ, तुमने अपनी बस्ती से तो सबको लाकर यहाँ बसते देखा है,लेकिन क्या कभी किसी वहाँ जा बसे व्यक्ति को अपनी बस्ती में आते देखा है?पथिक इस बात पर मौन रह गया।

Wednesday, October 26, 2016

तुम कौन हो लिखकर लाओ


गुरुजिएफ के पास जब पहली दफा आस्पेन्स्की गया तो गुरुजिएफ ने उससे कहा, एक कागज़ पर लिख लाओ तुम जो भी जानते हो, ताकि उसे मैं संभाल कर रख लूँ उस सम्बन्ध में कभी चर्चा न करेंगे। क्योंकि जो तुम जानते ही हो,बात समाप्त हो गयी।आस्पेन्स्की को कागज़ दिया। आस्पेन्सकी बड़ा पंडित था।और गुरुजिएफ से मिलने के पहले एकबहुत कीमती किताब जो लिख चुका था जो एक महत्वपूर्ण किताब थी।और जब गुरुजिएफ के पासआस्पेन्सकी गया,तो एक ज्ञाता की तरह गया था। जगतविख्यात आदमी था।गुरजिएफ को कोई जानता भी नहीं था। किसी मित्र ने कहा था गांव में,फुरसत थी,आस्पेन्सकी ने सोचा कि चलो मिल लें। जब मिलने गया तो गुरजिएफ कोई बीस मित्रों के साथ चुपचाप बैठा हुआ था।आस्पेन्स्की भी थोड़ी देर बैठा, फिर घबड़ाया। न तो किसी ने परिचय कराया,उसका कि कौन है,न गुरजिएफ ने पूछा कि कैसेआए हो। बाकी जो बीस लोग थे, वह भी चुपचाप बैठे थे तो चुपचाप ही बैठे रहे। पांच-सात मिनट के बाद बेचैनी बहुत आस्पेन्स्की की बढ़ गयी। न वहां से उठ सके,न कुछ बोल सके।आखिर हिम्मत जुटाकर उसने कोई बीस मिनट तक तो बर्दाश्त किया, फिर उसने गुरजिएफ से कहा कि माफ करिये, यह क्या हो रहा है?आप मुझसे यह भी नहीं पूछते कि मैं कौन हूँ?गुरजिएफ ने आँखें उठाकर आस्पेन्सकी की तरफ देखा और कहा, तुमने खुद कभी अपने से पूछा है कि मैं कौन हूँ?और जब तुमने ही नहीं पूछा, तो मुझे क्यों कष्ट देते हो? या तुम्हें अगर पता हो कि तुम कौन हो, तो बोलो। तो आस्पेन्स्की के नीचे से ज़मीन खिसकती मालूम पड़ी। अब तक तो सोचा था कि पता है कि मैं कौन हूँ।सब तरफ से सोचा, कहीं कुछ पता न चला कि मैं कौन हूँ।
     तो गुरजिएफ ने कहा, बेचैनी में मत पड़ों, कुछ और जानते होओ, उस सम्बन्ध में ही कहो। नहीं कुछ सूझा तो गुरजिएफ ने एक कागज़ उठाकर दिया और कहा, हो सकता है संकोच होता हो,पास के कमरे में चले जाओ। इस कागज पर लिख लाओ जो जो जानते हो। उस सम्बन्ध में फिर हम बात न करेंगे और जो नहीं जानते हो, उस सम्बन्ध में कुछ बात करेंगे।आस्पेन्सकी कमरे में गया।उसने लिखा है,सर्द रात थी,लेकिन पसीना मेरा माथे से बहना शुरू हो गया पहली दफा मैं पसीने पसीने हो गया।पहली दफे मुझे पता चला कि जानता तो मैं कुछ भी नहीं हूँ।यद्यपि मैने ईश्वर के सम्बन्ध में लिखा है,आत्मा के सम्बन्ध में लिखा है,लेकिन न तो मैं आत्मा को जानता हूँ,न मैं ईश्वर को जानता हूँ। वह सब शब्द मेरी आँखों में घूमने लगे। मेरी ही किताबें मेरे चारों तरफ चक्र काटने लगीं। और मेरी ही किताबें मेरा मखौल उड़ाने लगीं,और मेरे ही शब्द मुझसे कहने लगे, आस्पेन्सकी जानते क्या हो?और तब इसने वह कोरा कागज़ ही लाकर गुरजिएफ के चरणों में रख दियाऔर कहा,मैं बिलकुल कोरा हूँ जानता कुछ नहीं हूँ, अब जिज्ञासा लेकर उपस्थित हुआ हूँ वह जो कोरा कागज़ था, वह आस्पेन्स्की की समिधा थी।जब भी कोई पूरा विनम्र भाव से----विनम्र भाव का अर्थ है, पूरे अज्ञान के बोध से गुरु के पास सीखने जाए।

Friday, October 21, 2016

बंदगी

एक राजा की कथा है कि किसी बड़े राजा ने उसपर आक्रमण करके उसका राज्य छीन लिया। पुराने ज़माने में छोटे छोटे राज्य हुआ करते थे और बड़े राज्यों के शासकआमतौर पर या तो छोटे छोटे राजाओं से कर वसूल करते थे, या उन परआक्रमण करके उनके राज्य अपने अधिकार में ले लिया करते थे। ऐसा ही यहाँ भी हुआ।बड़े राजा ने छोटे राजा का राज्य दबा लिया। राज्य छिन जाने पर उसके मनमें संसार की असारता का गहरा प्रभाव पड़ा और वह दुनियादारी से किनारा करके जंगल में रहकर भजन-बन्दगी करने लगा।
     कुछ समय पश्चात उसकी बंदगी रंग लाई। वह एक सिद्ध महात्मा बन गया। लोग दूर दूर से उसके दर्शनों को आने लगे।आसपास उसकी बड़ी प्रसिद्धि फैल गई। और उसे बहुत माना जाने लगा। वह राजा भी जिसने उसकेराज्य को दबा लिया था उसने भी विजित राजा की प्रसिद्धि सुनी औरअपनी रानी तथा मन्त्रियों सहित दर्शन को चला। बड़ी श्रद्धा से उसने पराजित राजाअर्थात तपस्वी राजा के आगे सीस नवाया और हाथ जोड़कर विनय की,""भगवन्!आप मुझसेअपना राज्य वापिस ले लीजिये।
इसके अतिरिक्त और भी जो कुछ आप आज्ञा करें मैं उपहार के रूप में आपकी भेंट करूँ।''तपस्वी राजा ने उत्तर दिया,""महाराज! आपका बहुत बहुत धन्यवाद,जोआपने इस कदर सौजन्य प्रकट किया।राज्य की तो खैर अब मुझे कोई इच्छा नहीं रही।हाँ,यदिआप दे सकते हैं,तो मैं कुछ वस्तुयें माँगना चाहता हूँ।''विजयी राजा ने बड़े गर्व से कहा,""हाँ-हाँ?आपसंकोच त्यागकर कहिये। जो कुछ भी आप माँगेंगे, मै तुरन्त हाज़िर करूँगा।'' तपस्वी राजा ने कहा,""अच्छा! तो सुनिये, ऐसा जीवन जिसे कभी मृत्यु का खटका न हो, ऐसा धन जो स्थिर हो, ऐसा यौवन जिसे कभी बुढ़ापा नष्ट न कर सके,ऐसा सुख जिसके उपरान्त कभी दुःख नआने पावे,और ऐसी खुशी जिस पर कभी रंज या विषाद की अन्धेरी छाया न पड़ सके, बस ये पाँच वस्तुयें मुझे दरकार हैं। यदि आप दे सकते हैं,तो यही कृपा कीजिये।''विजयी राजा का सीस झुक गया।वह बोला,"'भगवन्!ये वस्तुयें तो मैं नहीं दे सकता।ये तो ईश्वर से ही मिल सकती हैं।''तपस्वी राजा ने इतने ज़ोर से अट्टहास किया कि जंगल और पहाड़ियाँ गूँज उठीं।""बस इसी बल-बूते पर दानशील बनने का दावा कर रहे थे आप?अरे नादान! ये सब वस्तुयें तू या और कोई इन्सान भी नहीं दे सकता। इसी कारण तो मैने उस लोक-परलोक के स्वामी परमेश्वर की शरण ली है।तथा यदि ये सब प्राप्त न हों, तो फिर राज्य ले लेने से भी क्या लाभ होगा? जाओ,अपना काम करोऔर मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।''
     मनुष्य की सीमाबद्ध शक्ति कर भी क्या सकती है और मालिक की असीम शक्तियाँ क्या नहीं कर सकती।यही समझनेऔर विचार करने की बात है।अज्ञानी मनुष्य आमतौर पर यह सोचा करते हैं कि हूँह। मालिकहमें खाने के लिये देने थोड़े ही आवेगा।लेकिन यही तो उनकी भूल है। मालिक तो उऩ्हें भी भोजन और सुख की सब सामग्री देता है, जो कभी भूलकर भी उसकी याद नहीं करते।फिर जो भक्त सबका भरोसा त्याग कर उसी प्रभु का ही भरोसा मन में दृढ़ कर लेगा और उसकी याद मे दिलो-जान से लगा होगा क्या वे प्रभु उसकी सँभाल और देखभाल न करेंगे? वह मालिक अपने भक्तों का दुःख दर्द बटाने और उनकी सँभाल करने को सदा प्रस्तुत रहते  हैं।

Tuesday, October 18, 2016

करोड़ों रूपया देकर भी एक क्षण न मिला


     एक कंजूस-महाकंजूस की मौत करीब आयी।उसने करोड़ों रूपये इकट्ठे कर रखे थे।और वह सोच रहा था किआज नहीं कल जीवन को भोगूंगा। लेकिन इकट्ठा करने में सारा समय चला गया, जैसा कि सदा ही होता है। जब मौत ने दस्तक दी तब वह घबड़ाया, कि समय तो चूक गया, धन भी इकट्ठा हो गया, लेकिन भोग तो मैं पाया नहीं। सोच ही रहा था कि भोगना है। यह तो ज़िन्दगी भर से सोच रहा था और स्थगित कर रहा था कि जब सब हो जाएगा तब भोग लूँगा। उसने मौत से कहा, कि मैं एक करोड़ रूपये दे देता हूँ, सिर्फ चौबीस घंटे मुझे मिल जाएं। क्योंकि मैं भोग तो पाया ही नही। मौत ने कहा,कि यह सौदा नहीं हो सकेगा।उसने कहा कि मैं पाँच करोड़ दे देता हूं,मैं दस करोड़ दे देता हूँ,सिर्फ चौबीस घंटे। यह सब उसने इकट्ठा किया पूरा जीवन गँवाकर। अब वह सब देने को राज़ी है चौबीस घंटे के लिये। क्योंकि न तो उसने कभी पूरा मन से साँस ली,न कभी फूलों के पास बैठा,न उगते सूरज को देखा,न चांद तारों से बात की।न खुलेआकाश के नीचे हरी दूब पर कभी क्षण भर लेटा। जीवन को देखने का मौका न मिला। धन एकत्र करता रहा और सोचता रहा,आज नहीं कल,जब सब मेरे पास होगा, तब भोग लूँगा। सब देने को राज़ी है, लेकिन मौत ने कहा कि नहीं। कोई उपाय नहीं। तुम सब भी दो,तो भी चौबीस घंटे मैं नहीं दे सकती हूँ। कोई उपाय नहीं, समय गया। तुम उठो, तैयार हो जाओ। तो उस आदमी ने कहा, एक क्षण,वह मेरे लिए नहीं,मैं लिख दूँ, मेरे पीछे आने वाले लोगों के लिए। मैने ज़िन्दगी गँवायी इस आशा में, कि कभी भोगूँगा और जो मैने कमाया उससे मैं मृत्यु से एक क्षण भी लेने में समर्थ न हो सका। उस आदमी ने यह एक कागज़ पर लिख दिया और खबर दी कि मेरी कब्रा पर इसे लिख देना।
   सभी कब्राों पर लिखा हुआ है। तुम्हारे पास पढ़ने को आँखें हो तो पढ़ लेना और तुम्हारी कब्रा पर भी यही लिखा जाएगा, अगर चेते नहीं। अगर तुम देखो, तो तुम्हें जो मिला है वह अपरंपार है। जीवन का कोई मुल्य है? एक क्षण के जीवन के लिए तुम कुछ भी देने को राज़ी हो जाओगे। लेकिन वर्षों के जीवन के लिए तुमने परमात्मा को धन्यवाद भी नहीं दिया।मरूस्थल में मर रहे होंगे प्यासे,तो एक घूंट पानी के लिए तुम कुछ भी देने को राज़ी हो जाओगे। लेकिन इतनी सरिताएँ बह रही हैं, वर्षा में इतने बादल तुम्हारे घर पर घुमड़ते हैं, तुमने एक बार उन्हें धन्यवाद नहीं दिया। अगर सूरज ठंडा हो जाएगा तो हम सब यहीं के यहीं मुर्दा हो जाएंगे, इसी वक्त लेकिन हमने कभी उठकर सुबह सूरज को धन्यवाद न दिया।

Friday, October 14, 2016

दुःखों की गठरियां


एक यहूदी फकीर हुआ। वह फकीरअपने दुःखों से बहुत परेशान हो गया है। कौन परेशान नहीं हो जाता है? हम सब अपने दुःखों से परेशान हैं। और हमारे दुःख की परेशानी में सबसे बड़ी परेशानी दूसरों के सुख हैं। दूसरे सुखी दिखाई पड़ते हैं और हम दुःखी होते चले जाते हैं।हम सोचते हैं कि सारी दुनियाँ सुखी है,एक मैं ही दुःखी हूँ। उस फकीर को भी ऐसा ही हुआ। उसने एक दिन रात परमात्मा को कहा कि मैं तुझसे यह नहीं कहता कि मुझे दुःख न दे, क्योंकि अगर मैं दुःख देने योग्य हूँ तो मुझे दुःख मिलेगा ही, लेकिन इतनी प्रार्थना तो कर सकता हूँ कि इतना ज्यादा मत दे। दुनियां में सब लोग हँसते दिखाई पड़ते हैं, लेकिन मैं भर एक रोता हुआ आदमी हूँ। सब खुश नज़र आते हैं एक मैं ही उदास,अंधेरे में खो गया हूं। आखिर मैने तेरा क्या बिगाड़ा है? एक कृपा कर,मुझे किसी भी दूसरे आदमी का दुःख दे दे और मेरा दुःख उसे दे दे, बदल दे किसी से भी, तो भी मैं राज़ी हो जाऊँगा।
     रात वह सोया और उसने एक सपना देखा। एक बहुत बड़ा भवन है और उस भवन में लाखों खूंटियां लगी है। और लाखों लोग चले आ रहे हैं। और प्रत्येक आदमी अपनी अपनी पीठ पर दुःखों की एक गठरी बांधे हुए है। दुखों की गठरी देखकर वह बहुत डर गया,क्योंकि उसे बड़ी हैरानी मालूम पड़ी। जितनी उसकी गठरी है दुखों की-वह भीअपनी दुःखों की गठरी टांगे हुए है-सबके दुःखों की गठरियों का जो आकार है,वह बिलकुल बराबर है। मगर बड़ा हैरान हुआ। यह पड़ोसी तो उसका रोज मुस्कुराता दिखता था।औरसुबह जब उससे पूछता था कि कहो कैसे हाल हैं, तो वह कहता था कि बड़ा आनन्द है,ओ के,सब ठीक है।यह आदमी भी इतने ही दुःखों का बोझ लिये चला आ रहा है। उसमें नेता भी उतना ही बोझ लिये हुए हैं।अनुयायी भी उतना ही बोझ लिये हुए हैं।उसमें सभी उतना बोझ लिये हुए चले आ रहे हैं। ज्ञानी और अज्ञानी,अमीर और गरीब,और बीमार और स्वस्थ,सबके बोझ की गठरी बराबर है।
     आज पहली दफा गठरियां दिखाई पड़ीं। अब तक तो चेहरे दिखाई पड़ते थे। फिर उस भवन में एक जोर की आवाज़ गूँजी कि सब लोग अपने अपने दुःखों को खूंटियों पर टांग दें। इसने भी जल्दी से अपना दुःख खूंटी पर टांग दिया। सारे लोगों ने जल्दी की है अपना दुःख टांगने की। कोई एक क्षण अपने दुःख को अपने ऊपर रखना नहीं चाहता। टांगने का मौका मिले,तो हम जल्दी से टांग ही देंगे।और तभी एक दूसरी
आवाज़ गूँजी किअब जिसने जिसकी गठरी चुनना हो वह चुन ले तो हम सोचेंगे कि उस फकीर ने जल्दी से किसी और की गठरी चुन ली होगी। नहीं, ऐसी भूल उसने नहीं की। वह भागा घबरा कर अपनी ही गठरी को उठाने के लिए कि कहीं और कोई पहले न उठा ले,अन्यथा मुश्किल में पड़ जाये,क्योंकि गठरियां सब बराबर थीं। अब उसने सोचा कि अपनी गठरी ही ठीक है,कम से कम परिचित दुःख तो हैं उसके भीतर।दूसरे की गठरियों के भीतर पता नही कौन से अपरिचित दुःख हैं। परिचित दुःख फिर भी कम दुःख है-जाना-माना,पहचाना। घबराहट में दौड़कर अपनी गठरी उठा ली कि कोई और दूसरा मेरी न उठा ले। लेकिन जब उसने घबराहट में उठाकर चारों तरफ देखा तो उसने देखा कि सारे लोगों ने दौड़कर अपनी ही उठा ली है, किसी ने भी किसी की नहीं उठाई।उसने पूछा कि इतनी जल्दी क्यों कर रहे हो अपनी उठाने की?तो उन्होने कहा कि हम डर गए। अब तक हम यही सोचते थे कि सारे लोग सुखी हैं,हम ही दुःखी हैं।उसने जिससे पूछा उस भवन में,उसने यही कहा कि हम यही सोचते थे कि सारे लोग सुखी हैं। हम तो तुम्हें भी सुखी समझते थे, तुम भी तो रास्ते पर मुस्कुराते हुए निकलते थे। हमने कभी सोचा न था कि तुम्हारे भीतर भी इतनी गठरियों के दुःख हैं। उस फकीर ने पूछा,अपने-अपने क्यों उठा लिए,बदल क्यों न लिए? उन्होने कहा हम सबने प्रार्थना की थी भगवान से आज रात कि हम अपनी गठरियां बदलना चाहते हैं दुःखों की।मगर हम डर गए। हमें ख्याल भी न था कि सब के दुःख बराबर हो सकते हैं। फिर हमने सोचा अपनी ही उठा लेना अच्छा है। पहचान का है, परिचित है।और नए दुःखों में कौन पड़े। पुराने दुःख धीरे धीरे हम आदी भी तो हो जाते है उनके।
    उस रात किसी ने भी किसी की गठरी न चुनी। फकीर की नींद टूट गई। उसने भगवान को धन्यवाद दिया कि तेरी बड़ी कृपा है कि मेरा ही दुःख मुझे वापिस मिल गया।अब मैं कभी ऐसी प्रार्थना न करूँगा।

Sunday, October 9, 2016

मौत को सदा याद रखो


एक युवक एक सन्त जी के पास आता था।एक दिन उसने उनसे प्रश्न किया कि आपका जीवन ऐसा निर्मल है आपके जीवन की धारा ऐसी निर्दोष है कि कहीं कोई मलिनता नहीं दिखाई देती।आपका जीवन इतना पवित्र है, आपके जीवन में इतनी सात्विकता है इतनी शान्ति है लेकिन मेरा मन में यह प्रश्न उठता है कि कहीं यह सब ऊपर ही ऊपर तो नहीं, कहीं ऐसा तो नहीं कि भीतर मन में विकार भी चलते हों मन में वासनायें भी चलती हों भीतर पाप भी चलता हो भीतर अपिवत्रता, बुरार्इंया हों भीतरअन्धकार हो,अशान्ति हो,चिन्ता हो ऊपर से आपने सब व्यवस्था कर रखी हो। क्योकि मुझे भरोसा नहीं आता कि अदमी इतना शुद्ध कैसे हो सकता है मैने आपको सब तरफ से देखा और परखा है कहीं कोई भूल दिखाई नहीं पड़ती। हो सकता है मेरी खोज की सामथ्र्य आपकी छिपाने की सामथ्र्य से कम होगी ऐसा सन्देह मन में होता है कि आप में कहीं न कहीं भूल होनी चाहिए।
       सन्त जी ने कहा कि तुम्हारा प्रश्न का उत्तर तो मैं बाद में दूँगा। कई दिन से एक बात मैं तुझे कहना चाहता था लेकिन कह नहीं पाता था। वह ये कि कई दफे तेरा हाथ पर नज़र गई लेकिन में सोचता था अभी तो देर हैअभी क्यों तुझे मरने से पहले मार देना। लेकिन अब देर नहीं है अब सत्य को छिपाना उचित नहीं है। कल सुबह सूरज उगने के साथ ही तेरा अन्त हो जायेगा। इधर सूरज उगेगा, उधर तेरा सूरज डूब जायेगा। तेरी मौत की घड़ी करीब आ गई है।यह हमारा तुम्हारा आखरी मिलन है। अब मै तुझे कह के निश्चिन्त हुआ। तुझसे कह के मेरा बोझ हलका हो गया।अब तू पूछ क्या पूछना है?वह युवक प्रश्न पूछना भूल गया। जब अपनी मौत आ गई तो किस में दोष हैं किसमें दोष नहीं हैं किसको क्या प्रयोजन है? वह उठकर खड़ा हो गया उसने कहा कि मुझे अभी कोई प्रश्न नहीं सूझता।मुझे अब घर जाने दें। सन्त ने कहा।रूको भी इतनी जल्दी क्या है। कल सुबह कोअभी काफी देर है अभी तो दिन पड़ा है रात पड़ी है चौबीस घन्टे लगेंगे इतनी घबड़ाने की कोई ज़रूरत नहीं हैअपना प्रश्न तो पूछते जाओ फिर मैं उत्तर दे न पाऊंगा। क्योंकि कल तुम विदा हो जाओगे। युवक ने कहा रखो अपना उत्तर अपने पास मुझे कोई प्रश्न नहीं पूछना मुझे घर जाने दो।हाथ पैर उसके काँपने लगे। आया था  तो शरीर में  बल था जवानी थी लेकिन लौटते समय दीवार का सहारा लेकर चलने लगा।अचानक स्वास्थ्य खो गया।घर जाकर बिस्तर पर लग गया घर के लोगों ने कहा क्या हुआ है आज?कोई बिमारी है, कोई दुःख है कोई पीड़ा है,कोई चिन्ता है? उस युवक ने कहा न कोई बिमारी है न कोई दुःख लेकिन सब गया चिन्ता है भीतर एक कँपकपी है कल मर जाना है फकीर ने कहा है कि उम्र की रेखा कट गई है। घर के लोग रोने लगे। मोहल्ले पड़ोस के लोग एकत्र हो गये। वह युवक बुझी बुझी हालत में था। अब गया तब गया। तभी फकीर ने द्वार पर दस्तक दी कहा रोओ मत। मुझे भीतर आने दो।चुप हो जाओ।उस युवक को हिलाया कहाआँखें खोल उसने आँखें खोलीं। फकीर ने कहा तेरे सवाल का जवाब देने आया हूँ युवक ने कहा जवाब माँगता कौन है?फकीर ने कहा जो मैने यह तेरे हाथ की रेखा की बात कही है वह तेरा सवाल का जवाब है अभी तेरी मौत आई नहीं है। वह युवक यह सुनकर उठकर बैठ गया-तो मौत नहीं आ रही है ?फकीर ने कहा यह मज़ाक था सिर्फयह बताने को कि अगर मौत आती है तो आदमी के जीवन में पाप खो जाता है।चौबीस घन्टे में कोई पाप किया? किसी को दुःख पहुँचाया?किसी से झगड़ा किया?उस युवक ने कहा-दुःख की बात करते हैं। दुश्मनों से क्षमा माँग ली। सिवाय प्रार्थना के इन चौबीस घन्टों में कुछ नहीं किया। फकीर ने कहा जो पवित्रता मेरे जीवन में दिखाई देती है वह मौत के बोध के कारण है। तुझे चौबीस घन्टे बाद मौत दिखाई पड़ी मुझेचौबीस साल बाद दिखाई पड़ती है इससे क्या फर्क पड़ता है मौत सत्तर दिन बाद आयेगी कि सत्तर साल बाद आयेगी। जो आ रही है वहआ ही गई है।इस बोध ने मेरे जीवन को बदल दिया है।
मृत्यु का बोध जीवन को रूपान्तरित करता है जीवन को पुष्य कीगरिमा से भरता है जीवन को पवित्रता की सुवास से भरता है जीवन को पँख देता हैपरलोक जाने के लिये परमात्मा की खोज कीआकाँक्षा जगाता है।

Thursday, October 6, 2016

अनुचित व्यवहार पर भी प्रभु से क्षमा याचना


     अयोध्या निवासी एक सन्त परम वैष्णव थे। दया-क्षमा और करूणा उन के जीवन के आभूषण थे। एक बार वे नौका द्वारा सरयू नदी को पार करने की इच्छा से घाट पर आये। उस समय नदी बाढ़ पर थी। एक ही नौका थी इसलिये उसमें पहले से ही अनेक यात्री बैठे थे। उन में आज के चंचलता और कुटिलता से भरे हुए युग के प्रतिनिधि पाँच-सात व्यक्ति भी विद्यमान थे। सन्त और सन्त के वेष में ऐसों को वैसे ही प्रायः घृणा होती है। किसी की खिल्ली उड़ाना उन का सहज स्वभाव था। फिर कोई सन्त उनकी नाव में आ बैठे-यह उनको स्वीकार न था। उन्हीं कुटिल युवकों की ओर से आवाज़ आई यहाँ स्थान नहीं है। दूसरी नौका से आ जाना। अनेक प्रकार के कटु शब्द भी कह दिये। सन्त जी असमंजस में पड़ गये। नौका दूसरी कोई थी नहीं। उन्होने नाविक से प्रार्थना की। मल्लाह ने कहा- एक ओर बैठ जाइये।
     वे दुष्ट प्रकृति के लोग कुछ कह न सके, और अब लगे उन सन्त जी पर ही कीच उछालने। परन्तु साधू जी शान्त भाव से भगवन्नाम का स्मरण करते रहे। नाव जब जल के बीच पहुँची तो वह शठ मण्डली और भी चंचल हो गई। कोई उन पर पानी उलीचने लगा, किसी ने कंकड़ी दे मारी, एक ने पास में पड़ा नुकीला कील ही उन की खोपड़ी पर फैंक दिया, परिणाम यह हुआ कि सिर से रुधिर बहने लगा। परन्तु सन्त जी उसी शान्ति की मुद्रा मैं बैठे रहे। अत्याचार की मात्रा और बढ़ गई, दूसरे यात्रियों ने उन दुर्जनों को रोका, किन्तु वे कहां मानने वाले थे। भक्तों के अंग-संग श्री भगवान ही तो होते हैं। उनसे भक्त के दुःख को कहां देखा जा सकता है। तत्काल आकाशवाणी हुई। महात्मन्! आप आज्ञा दें तो इन दुष्टों को क्षण भर में भस्मसात कर दिया जाय।
     आकाशवाणी के सुनते ही सब के सब निस्तब्ध रह गये। अब उन्हें काटो तो खून नहीं। अब तक जो सिंह बने हुए थे, उन सबको काठ मार गया। उनकी बोलती बन्द हो गई। परन्तु प्रभु भक्त सन्त जी ने दोनों हाथ जोड़कर परमेश्वर से प्रार्थना की- हे दयासिन्धो! आप ऐसा कुछ भी न कीजिये ये अबोध बच्चे हैं। आप ही यदि इनकी अवज्ञाओं को न भुलाएंगे तो और कौन ऐसा दयावान है। आपका यदि मुझ पर स्नेह है तो इन्हें घनी घनी क्षमा दे दें। इनको सद्बुद्धि प्रदान करें। ये सुजन बन जायें। आपके श्री चरणारविन्दों में इनकी भी प्रीति हो जावे। यह है मानवता। इस जगतीतल पर मनुष्य के जीवन का आदर्श यही होना चाहिये।

Sunday, October 2, 2016

मानसी पूजा


नोट-सन्त बुल्लेशाह इनायतशाह के शिष्य थेऔर बुल्ला साहिब, जिनका नाम पहले बुलाकी राम था,सन्त यारी साहिब के गुरुमुख शिष्य थे। और गुलालचन्द, जो बाद में गुलाल साहिब के नाम से प्रसिद्ध हुए,उनके यहाँ बुल्लेसाहिब नौकरी करते थेऔर विशेषकर हल चलाने के काम पर नियुक्त थे।गुलाल साहिब जब कभी बुल्ला साहिब को काम पर भेजते तो बुल्ला साहिब भजन-ध्यान में लग जाने के कारण प्रायः देर कर देते थे। अन्य नौकरों ने कई बार इनकी सुस्ती की शिकायत गुलालसाहिब से की और वह कई बार बुल्ला साहिब पर क्रद्ध हुए।
     एक दिन का बात है कि बुल्ला साहिब हल चलाने के लिए खेत पर गए थे कि वहँा भगवान के ध्यानऔर मानसी सेवा में लग गए। उसी समय गुलालसाहिब मौके पर पहुंच गएऔर बैलों को हल के साथ फिरते और बुल्लासाहिब को खेत की मेंड़ परआँखें बन्द किये हुए बैठा देखकर यह समझे कि बुल्ला साहिब ऊँघ रहे हैं, अतः गुलाल साहिब ने क्रोध में भरकर उन्हें लात मारी जिससे बुल्ला साहिब एक बारगी चौंक उठे और उनके हाथ से दही छलक गया।यह कौतुक देखकर गुलाल साहिब हक्के-बक्के हो गए। क्योंकि बुल्ला साहिब के हाथ में दही का कोई बर्तन नहीं था। यद्यपि गुलाल साहिब ने बुल्ला साहिब को बड़ी ज़ोर की लात मारी थी, परन्तु फिर भी बुल्ला साहिब बड़ी ही विनम्रता के साथ बोले-क्षमा कीजिये,मैं भगवान का ध्यान करते-करते उनकी सेवा में लग गया था और उन्हें भोग लगवाने के लिए भोजन परोस चुका था,केवल दही बाकी था, उसे परोस ही रहा था कि आपके हिला देने से वह दही गिर गया। बुल्लासाहिब की ऐसी मन की तन्मयताऔर उच्चअवस्था देखकर गुलाल साहिब उनके चरणों पर गिर पड़े,अपनेअपराध के लिए क्षमा माँगी और उसी समय बुल्ला साहिब को अपना गुरु धारण कर लिया।
     उपरोक्त प्रमाण से सत्संगी एवं जिज्ञासु पुरुष स्वयं ही समझ सकते हैं कि मन के एकाग्रता एवं तन्मयतापूर्वक साधन में लगने का कितना महानलाभ है,इसलिए भक्ति के साधनों परआचरण करते हुए जिज्ञासु को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहियेऔर इस बात की पूरी कोशिश करना चाहिये कि शरीरऔर इन्द्रियों के साथ साथ उसका मन भी इन साधनों में एकाग्रता और तन्मयता के साथ संलग्न रहे। ऐसा करने से निश्चय ही उसे पूरा पूरा लाभ होगा और वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होगा।

Monday, September 26, 2016

शिवाजी द्वारा किला बनवाना


आम संसारी मनुष्य अज्ञानवश आजीविका की चिंता में पड़कर व्यर्थ ही स्वयं को दुःखी और परेशान किये रहता है। उसे हर समय यही चिंता सताती रहती है कि यदि वह आजीविका का प्रबन्ध न करे, तो शायद वह, उसका परिवार तथा आश्रितजन-सभी भूखे मर जायें। किन्तु सत्पुरुषों का कथन है कि यह मनुष्य की भूल एवं अज्ञानता है।
     छत्रपति शिवाजी के समय की घटना है। वे एक पहाड़ी के ऊपर किला बनवा रहे थे, जिसके निर्माण में सैंकड़ों व्यक्ति लगे हुये थे। एक दिन शिवाजी केले का निरीक्षण कर रहे थे। इतने व्यक्तियों को काम में लगे देखकर उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि मेरे किला बनवाने से कितने लोगों की रोज़ी-रोटी का प्रबन्ध हो रहा है। यदि मैं यह किला न बनवाता, तो पता नहीं इनका गुज़ारा कैसे चलता? शिवाजी के गुरुदेव समर्थ स्वामी गुरु रामदास जी समय के पूर्ण महापुरुष थे। महापुरुष तो त्रिकालवदर्शी और घट-घट की जानने वाले होते हैं, फिर भला शिवाजी के मन की बात उनसे कहां छिपी रह सकती थी? शिवा जी के मन से इस भ्रम को दूर करने के लिये वे तुरन्त किले की ओर चल दिये। वे जैसे ही किले के निकट पहुँचे, एक सैनिक ने तत्काल शिवाजी को उनके आने की सूचना दी। गुरुदेव के आगमन का समाचार पाकर शिवाजी किले के नीचे उतर आये और गुरुदेव के चरणों में प्रणाम कर हाथ जोड़कर खड़े हो गये। समर्थ स्वामी गुरु रामदास जी ने एक बड़े पत्थर की ओर संकेत करते हुये फरमाया-शिवा! इस पत्थर को बीच से तुड़वाओ। शिवाजी ने तुरन्त मिस्त्रियों को पत्थर तोड़ने का आदेश दिया। पत्थर के टूटने पर सब यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि वह पत्थर बीच में से पोला है, अर्थात उसमें एक गड्ढा बना है जिसमें पानी भरा है और एक मेंढक उसमें बैठा हुआ है। श्री गुरुदेव ने शिवाजी को सम्बोधित करते हुये फरमाया-शिवा! इस मेंढक को खाना-पीना कौन दे रहा है?
     गुरुदेव के ये वचन सुनते ही शिवाजी चौंक उठे और उन्हें अपने मन में उत्पन्न वह विचार स्मरण हो आया कि मेरे किला बनवाने से कितने लोगों की रोज़ी-रोटी का प्रबन्ध हो गया। उन्हें अपनी भूल का अनुभव हुआ, अतः उन्होने गुरुदेव के चरणों में गिर कर क्षमा माँगी। श्री गुरुदेव ने फरमाया ऐसा विचार पुनः कभी भी मन में न लाना।  सबको रोज़ी-रोटी देने वाला परमात्मा है। जबकि वह पत्थरों में रहने वाले जीवों का भी ध्यान रखता है, तो क्या जो किले के निर्माण में कार्यरत हैं, उनका ध्यान वह न रखेगा? शिवाजी ने अपनी भूल के लिये पुनः क्षमायाचना की। इसी विषय में गुरुवाणी में फरमान हैः-
     सैल पथर महि जँत उपाए ता का रिजकु आगै करि धरिआ।
कहने का अभिप्राय यह कि सबकी आजीविका तथा पालन पोषण का दायित्व मालिक का है और वही सबको रोज़ी रोटी देता है। इसलिये इस विषय में मनुष्य को अधिक चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। इसका अर्थ कोई यह न समझ ले कि धनोपार्जन करने अथवा कामकाज करने से मना किया जा रहा है तथा आलसी एवं निकम्मा बन जाने की और काम काज से जी चुराने की शिक्षा दी जा रही है। नहीं, ऐसा कदापि नहीं है पुरुषार्थ करना तथा संसारिक कर्तव्यकर्मों से जी चुराने की शिक्षा सन्त सत्पुरुष कभी नहीं देते, परन्तु हर समय आजीविका की चिंता में गलतान रहकर जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूल जाना यह कदापि उचित नहीं है।

Thursday, September 22, 2016

दूनी चन्द


     दूनीचन्द ने श्री गुरुनानक देव जी के चरणों में विनय की-मेरे पास सात लाख रुपये हैं,जिन में हर समय मेरा मन लगा रहता है। आप मुझे कोई ऐसी युक्ति बताएं, जिससे यह माया परलोक में मेरे साथ जा सके।
सतपुरुष तो जगत में आते ही जीवों को प्रमाद की निद्रा से जगाने और उन्हें सत्पथ पर लगाने के लिये हैं, अतएव उन्होने उसे एक सुई देते हुए फरमाया- तुम पहले हमारा एक काम करो। यह सुई संभालकर रख लो, परलोक में हम यह सुई तुम से वापस ले लेंगे।
     दुनीचन्द ने सुई ले ली और अपनी स्त्री के पास जाकर बोला-महापुरुषों ने यह सुई दी है और फरमाया है कि इसे परलोक में वापिस ले लेंगे,इसलिये इस सुई को कहीं सम्भाल कर रख लो। उनकी पत्नी ने कहा-जब कि संसार की कोई भी वस्तु यहां तक कि मनुष्य की देह भी उसके साथ नहीं जाती,तो फिर आप यह सुई  कैसे साथ ले जायेंगे?यह सुई उन्हें वापिस कर दीजिए। ज्ञात होता है कि यह सुई उन्होने केवल आपकी आँखें खोलने के लिए ही आपको दी है ताकिआपको इस बात का ज्ञान हो जाये कि एक सुई तक भी यहाँ से मरते समय साथ नहीं जाती। वे अवश्य  ही पूर्ण महापुरुष हैं और हमारे कल्याण के लिये ही हमारे घर में पधारे हैं।इसलिये मेरी मानिये तो उनकी शरण ग्रहण कर जीवन का उद्धार कीजिये। तत्पश्चात दोनों ने श्री गुरु नानकदेव जी के चरणों में उपस्थित होकर विनय की-गुरुदेव! ये सुई मैं आपको परलोक में कैसे दे सकता हूँ क्योंकि इसे परलोक में मैं कैसे ले जा सकता हूँ। श्री गुरुनानक देव जी ने फऱमाया जैसे एकत्र किया हुआ सारा धन ले जाओगे वैसे ये सुई भी ले जाना। दूनीचन्द तुम अमीर नहीं हो तुम गरीब हो क्योंकि साथ ले जाने वाला धन तुम्हारे पास नहीं है।सम्पत्ति वही होती है जो विपत्ति में काम आये। तब श्री गुरुनानकदेव जी ने यह बाणी उच्चारण की।
          लख मण सुइना लख मण रूपा लख साहा सिरि साह।।
          लख लसकर लख बाजे नेजे लखी घोड़ी पातिसाह।।
          जिथै साइरु लंघणा अगनि पाणी असगाह।।
          कंधी  दिसि न आवई  धाही  पवै  कहाह।।
          नानक ओथै जाणीअहि साह केई पातिसाह।।
अर्थः-किसी के पास लाखों मन सोना हो,लाखों मन चांदी हो,लाखों शाहों का भी वह शाह हो,लाखों की सेना हो,लाखों वादन हों,तथा उस बादशाह के पास लाखों घोड़े हों, परन्तु जहां संसार-सागर को पार करना है, जहाँ अथाह आग-पानी विद्यमान है,जहां किनारा दिखाई नहीं पड़ता, जहां लोग चीख-चीखकर शोर मचाते हैं, श्री गुरुनानक देव जी फरमाते हैं कि वहां पता चलता है कि वास्तविक अर्थों में बादशाह कौन है?बादशाह वास्तव में वही है,जो गुरु कीआज्ञानुसार नाम की कमाई करके भवसागर से पार हो जाता है। श्री गुरुनानकदेव जी के वचन सुनकर दोनों ने श्रद्धासहित उनकी स्तुति कर विनय की हम आपकी शरण हैं हमें भव से पार कीजिए।आपने हमारे ऊपर अत्यन्त कृपा की हैआज हम कृतार्थ हो गये। हमेंअपने शिष्यत्व में लीजिये।श्री गुरुनानकदेव जी ने उन्हेंनाम का सच्चा धन बख्शीश किया। आज्ञानुसार नाम की कमाई कर वे अपना जन्म सफल कर गये और लोक-परलोक संवार गये।

Sunday, September 18, 2016

अहंकार की पोटली


एक सम्राट एक रथ से गुज़रता था। जंगल से आता था शिकार करके। राह पर उसने एक भिखारी को देखा,जो अपनी पोटली को सिरपर रखे हुए चल रहा था।उसे दया आ गई। बूढ़ा भिखारी था। राजपथ पर मिला होता,तो शायद सम्राट देखता भी नहीं। इस एकान्त जंगल में-उस बूढ़े के थके-माँदे पैर,जीर्ण देह,उस पर पोटली का भार-उसे दया आ गई। रथ रोका, भिखारी को ऊपर रथ पर ले लिया। कहा, कि हाँ तुम्हें जाना है, हम राह में तुझे छोड़ देंगे। भिखारी बैठ गया।सम्राट हैरान हुआ पोटली वह अब भी सिर पर रखे हुए है?उसने कहा,""मेरे भाई,तू पागल तो नहीं है? पोटली अब क्यों सिर पर रखे है?अब तो नीचे रख सकता है। राह पर चलते समय पोटली सिर पर थी,समझ में आती है। पर अब रथ पर बैठकर किसलिए पोटली सिर पर रखे है?'' उस गरीब आदमी ने कहा, ""अन्नदाता,आपकी इतनी ही कृपा क्या कम है कि मुझे रथ पर बैठा लिया। अब पोटली का भार और रथ पर रखूँ क्या यह योग्य होगा?'' लेकिन तुम सिर पर रखे रहो, तो भी भार तो रथ पर ही पड़ रहा है।
     ठीक वैसी ही दशा है सन्देह और श्रद्धा की। तुम सोचते हो-सोच तो वही रहा है। तुम करते हो-कर भी वही रहा है। तुम नाहक ही बीच में निर्मित हो जातो हो। तुम यह जो पोटली सिर पर ढो रहे होअहंकार की और दबे जा रहे हो,और अशान्त,और परेशान।और रथ उसका चल ही रहा है, तुम कृपा करो। रथ पर ही पोटली भी रख दो, जिस पर तुम बैठे हो। तुम निÏश्चत होकर बैठ जाओ।श्रद्धा का इतना ही अर्थ है।श्रद्धा इस जगत में परम बोध है। सन्देह अज्ञान है। वह बूढ़ा आदमी मूढ़ था। थोड़ी सी समझ हो, तो पोटली तुम नीचे रख दोगे। सब चल ही रहा है। जब तुम नहीं थे,तुम कल नहीं रहोगे,तब भी सब चलता रहेगा।तुम क्षण भर को हो यहाँ। तुम क्यों व्यर्थ अपने को अपने सिर पर रखे हुए हो? उतार दो पोटली। जीवन,मरण दोनों उसी के हैं। सुख भी उसी का, दुःख भी उसी का। बीमारी भी उसी की,स्वास्थ्य भी उसी का। अगर तुम बीच से बिलुकल हट जाओ,तो बड़ी से बड़ी क्रान्ति घटित होती है। जिस दिन तुम कहते हो,सब तेरा, उसी दिन दुःख मिट जाता है,उसी दिन मृत्यु मिट जाती है। क्योंकि दुःख और मृत्य अस्वीकार में है।
एक बात स्मरण रखें, जो दूसरे को दुःख देता है, वह अंततः दुःखी हो जाते हैं। और जो दूसरे को सुख देता है, वह अंततः बहुत सुख को उपलब्ध होता है।इस वजह से यह कह रहा हूँ कि जो सुख देने की चेष्टा करता है,उसके भीतर सुख के केन्द्र विकसित होते हैं।फल बाहर से नहीं आते हैं, फल भीतर पैदा होते हैं। हम जो करते हैं, उसी की रिसेप्टिविटी हमारे भीतर विकसित हो जाती है।जो प्रेम चाहता है,प्रेम को फैला देऔर जो आनंद चाहता है,वह आनंद को लुटा दे।और जो चाहता है,उसके घर पर फूलों की वर्षा हो जाये, वह दूसरों के आंगनों में फूल फेंक दे,और कोई रास्ता नहीं है।करुणा का एक भाव प्रत्येक को विकसित करना ज़रूरी है साधना के लिए।इसके साथ ही प्रमुदिता-उत्फुल्लता,प्रसन्नता, आनंद का एक बोध, विषाद का अभाव। हम सब विषाद से भरे हैं। हम सब उदास लोग, थके लोग हैं।हम सब हारे हुए,पराजित,रास्ते पर चलते हैं और समाप्त हो जाते हैं। हम ऐसे चलते हैं, जैसे आज ही मर गये हैं। हमारे चलने में कोई गतिऔर प्राण नहीं है,हम सुस्त हैं,और उदास हैं, और टूटे हुए हैं,और हारेहुए हैं।यह गलत है। जीवन कितना ही छोटा हो, मौत कितनी ही निश्चित हो,जिसमें थोड़ी समझ है, वह उदास नहीं होगा।

Tuesday, September 13, 2016

सुखी होने की तरकीब


दूसरों का सुख दिखायी पड़ता है, अपना दुःख दिखायी पड़ता है।अपना सुख दिखायी नहीं पड़ता दूसरे का दुःख दिखायी नहीं पड़ता।सब दुःखी हैं अपने दुःख के कारण नहीं, दूसरे के सुख के कारण। और जब तक आपकी यह वृत्ति है तब तक आप कैसे सुखी हो सकते हैं? सुखी होने का उपाय कुछ और है। दूसरे का दुःख अगर आपको दिखायी पड़ने लगे, तो आप सुखी होना शुरु हो गये। तब आपके चारों तरफ सुख का सागर दिखायी पड़ेगा।
     एक फकीर था जून्नून।कोई भी आदमी उसके पास मिलनेआता,तो वह हँसता खिलखिला कर और नाचने लगता। लोग उससे पूछते कि बात क्या है ?वह कहता एक तरकीब मैने सीख ली है सुखी होने की। मैं हर आदमी में से वह कारण खोज लेता हूँ,जिससे मैं सुखी हो जाऊँ। एक आदमी आया, उसके पास एक आँख थी, जुन्नून नाचने लगा। यह क्या मामला है?उसने कहा कि तुमने मुझे बड़ा सुखी कर दिया,मेरे पास दोआंखें हैं,हे प्रभु इसमें तेरा धन्यवाद।एक लंगड़े आदमी को देखकर वह सड़क पर ही नाचने लगा। उसने कहा कि गज़ब अपनी कोई पात्रता न थी, दो पैर दिये हैं। एक मुर्दे की लाश को लोग मरघट ले जा रहे थे। जुन्नून ने कहा,हम अभी जिन्दा हैं,और पात्रता कोई भी नहीं है।और कोई कारण नहीं है, अगर हम मर गये होते इस आदमी की जगह तो कोई शिकायत भी करने का उपाय नहीं था। उसकी बड़ी कृपा है।
     जुन्नून दुःखी नहीं था,कभी दुःखी नहीं हो सका क्योंकि उसने दूसरे का दुःख देखना शुरु कर दिया।और जब कोई दूसरे का दुःख देखता है तो उसकी पृष्ठभूमि मेंअपना सुख दिखायी पड़ता है।और जबकोई दूसरा का सुख देखता है तो उसकी पृष्ठभूमि में अपना दुःख दिखायी पड़ता है।
प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत करने का एक अन्य उपाय यह है कि मनुष्य को परमात्मा ने जो कुछ दे रखा है,सदा उसमें ही सन्तुष्ट रहे। परमात्मा का आभारी रहकर मन में यह विचार करता रहे कि अनेकों ऐसे मनुष्य भी संसार में होंगे, जिन्हे ये वस्तुयें भी उपलब्ध नहीं हैं।

Saturday, September 10, 2016

बिल्ली भर मत पालना।

एक फकीर मर रहा था तो उसने अपने शिष्य से कहा कि देख, एक बात का ख्याल रखना, बिल्ली भर मत पालना। वह फकीर मर गया इतना ही कहकर।इसकी व्याख्या भी न कर गया। शिष्य तो बड़ा परेशान हुआ। बिल्ली न पालना,आखिरी संदेश!कोई ब्राहृज्ञान की बात करनी थी। जीवन भर इस बुद्धू की सेवा कीऔर आखिर में मरते वक्त यह कह गया कि बिल्ली न पालना। बिल्ली हम पालेंगे ही क्यों?बिल्ली से लेना-देना क्या है। और बिल्ली पाल भी ली तो इससे मोक्ष में कौन-सी बाधा पड़ती है। किसी शास्त्र में लिखा नहीं कि बिल्ली मत पालना। बड़े-बड़े आदेश दिए हैं। ऐसा मत करना, वैसा मत करना, दस आज्ञाएँ हैं-मगर बिल्ली मत पालना।चोरी मत करना,बेईमानी मत करना,झूठ मत बोलना -समझ में आता है, मगर बिल्ली मत पालना, यह कौन सी नैतिकता का आधार है। उसे हैरान देखकर एक दूसरे बूढ़े आदमी ने कहा, तू परेशान मत हो। मैं तेरे गुरु को जानता हूँ, वह ठीक कह गया है। और मैं भी तुझसे कहता हूँ कि अगर उसकी बात मानकर चला तो बच जाएगा।
उसकी बात न मानी तो मुश्किल में पड़ेगा। क्योंकि वह मुश्किल में पड़ा था।शिष्य ने पूछा मुझे पूरी बात समझाकर कह दें,कैसी मुश्किल?क्योंकि मेरी अकल में ही नहीं बात बैठती। मैने बड़े शास्त्र पढ़े हैं, मगर बिल्ली मत पालना। तो उसने कहा,सुन तेरा गुरु कैसी मुसीबत में पड़ा।तेरे गुरु ने संसार छोड़ दिया डर से कि यहां फंस जाऊंगा,जैसे लोग छोड़ देते हैं डर से। शादी नहीं की,दुकान नहीं की बाज़ार में नहीं बैठा,भाग गया। जंगल में जाकर रहने लगा। एक मुसीबत आई। सिर्फ दो लंगोटियाँ थीं उसके पास।बस उतनी दो लंगोटियाँ ले गया था। वह सूखने डालता,रात को चूहे लंगोटी काट देते। उसने गांव के लोगों से पूछा कि क्या करना?
     उऩ्होने कहा एक बिल्ली पाल लो। बस वहीं से सारा उपद्रव शुरु हुआ, सारा संसार शुरु हुआ। बात जंची गुरु को,उसने बिल्ली पाल लीं। बिल्ली चूहे तो खा गई, लेकिन जब चूहे खा गई तब बिल्ली भूखी बैठी रहे वहां सूखने लगी। अब उसकी हत्या का पाप लगेगा। तो उस फकीर ने लोगों से पूछा कि भाई यह तो ठीक है,तुमने सुझाव दिया,तुम्हारी बात काम कर गई, चूहे खत्म कर दिए बिल्ली ने। मगर अब बिल्ली का क्या हो? तो उन्होने कहा, ऐसा करो,एक गाय पाल लो, तुम्हें भी दूध मिल जाएगा, बिल्ली को भी दूध मिल जाएगा। तुम यह जो रोज़ रोज़ भीख मांगने जाते हो, इस झंझट से भी बचोगे। और गाय हम दे देते हैं, हमारी भी झंझट मिटेगी कि तुम्हें रोज़-रोज़ आना,रोज़ तुम्हें हमें भिक्षा देना।गायें गांव के पास बहुत है, हम एक गाय तुम्हें गांव की तरफ से दे देते हैं।      फकीर को बात जंची, बात सीधी गणित की थी। गाय पाल ली, लेकिन झंझट-अब गाय के लिए घास चाहिए, भोजन चाहिए, गांव के लोगों ने
कहा, अच्छा यह हो कि ज़मीन तो यहां पड़ी ही है ढेर तुम्हारे पास,थोड़ी खेती-बाड़ी करने लगो,बैठे-बैठे करते भी क्या हो।तो घास भी हो जाएगा, गेहूँ भी हो जाएंगे,तुम्हारी रोटी का भी इंतजाम हो जाएगा। बिल्ली भी मज़ा करेगी, गाय भी मज़ा करेगी,तुम भी मज़ा करो। तो बेचारे ने खेती-बाड़ी शूरु की। अब खेती-बाड़ी करे कि भजन कीर्तन करे? गायों को सम्हाले,बिल्ली को सम्हाले कि शास्त्र पढ़े?फुर्सत ही न मिले भजनकीर्तन की। शास्त्र इत्यादि भूलने लगे।उसने गांव के लोगों से कहा,तुमने तो यह झंझट बना दी।मुझे समय ही नहीं मिलता।तो उन्होने कहा,ऐसा कामकरो कि गांव में एक विधवा है,उसका कोई है भी नहीं, वह भी परेशान है। उसको हम रख देते हैं यहां,तुम्हारी सेवा भी करेगी,रोटी भी--तुम मज़े से भजन करना, तुम कीर्तन करना, वह रोटी भी बना देगी। और मज़बूत विधवा है और किसान रही है, खेती-बाड़ी भी कर देगी।
     यह बात भी जंची। गणित फैलता चला गया। विधवा भी आ गई। उसने खेती-बाड़ी भी शुरु कर दी, हाथ-पैर भी दबा देती,बीमारी होती तो सिर भी दबा देती। फिर जो होना था सो हुआ। फिर विधवा से प्रेम लग गया। कुछ बुरा भी न था,आखिर इतनी सेवा करती थीऔर उस पर प्रेम न उमगे तो क्या हो। वे ही गांव के लोग आ गये कि यह बात ठीक नहीं अब अच्छा यही होगा कि आप इससे विवाह कर लो,क्योंकि इससे बड़ी बदनामी हो रही है,हमारे गांव की बदनामी हो रही है।तो विवाह हो गया, बच्चे हुए। फिर उपद्रव फैलता चला गया,फैलता चला गया। फिर बच्चों का विवाह हुआ। और उस बूढ़े आदमी ने कहा, तुम्हारा गुरु ठीक कहगया है कि बिल्ली मत पालना,यह उसकी ज़िन्दगी भर का सार है।
उस  बिल्ली से ही सब उपद्रव शुरु हुआ था।उपद्रव तो कहीं से भी शुरु हो सकते हैं।और बिल्ली की भीऔर गहराई में जाओ तो लंगोटी से शुरु हुआ।गुरु को असल में कहना था कि लंगोटी मत रखना। मगर कुछ तो रखोगे। लंगोटी,भिक्षापात्र,कुछ तो रखोगे। नहीं तो ज़िन्दगी चलेगी कैसे? जीओगे कैसे?कोई राजमहल ही नहीं बांधते हैं,कोई भी चीज़ बांध लेगी। तो असली सवाल यह नहीं है कि क्या तुम्हारे पास है,असली सवाल यह है कि क्या तुम्हारे पास वह कला है जिससे तुम वस्तुओं के बीच रहते हुए भी वस्तुओं से मुक्त रह सको?