Sunday, February 7, 2016

बन्दीछोड़


छठी पादशाही श्री हरिगोबिन्द साहिब जी के बढ़ते हुये यश को देखकर चन्दू हर समय अपने मन में ईष्र्या-द्वेष की अग्नि में जलता रहता था। एकबार उसनेआगरा के एक प्रसिद्ध ज्योतिषी को लालच देकर इस बात पर राज़ी कर लिया कि वह बादशाह जहांगीर के पास जाये और रमल फेंककर अथवा किसी अन्य प्रकार से उसे यह विश्वास दिलाये कि बादशाह के ऊपर साढेसाती आने वाली है। यह साढ़ेसाती बादशाह पर बहुत भारी है।जिसमें बादशाह के प्राण जाने का भी भय है।जब बादशाह इस साढ़ेसाती से बचने का उपाय पूछे,तो उससे यह कहे कि श्री गुरुहरि गोबिन्द साहिब जी को चालीस दिन ग्वालियर के किले में नज़रबन्द किया जायेऔर उनसे यह कहा जाये कि वे बादशाह के कुशल क्षेम के लिये मालिक के आगे प्रार्थना करें।ज्योतिषी लालच में आ गया।चन्दू के कहेअनुसार वह बादशाह के पास गयाऔर उसे साढ़ेसाती का भय दिखा कर कहा कि यदि आप गुरु हरिगोबिंद साहिब को चालीस दिन के लिये ग्वालियर के किले में रखेंऔर वे वहां रहकरआपके लिये मालिक से प्रार्थना करें,तोआपका कष्ट टल सकता है।बादशाह बहकावे में आ गया। उसने गुरुमहाराज जी से विनय की कि आप चालीस दिन ग्वालियर के किले में रहकर मेरे स्वास्थ्य के लिये मालिक से प्रार्थना करें। महापुरुषों की प्रत्येक कार्यवाही जीवों के हित एवं कल्याण के लिये ही होती है। उनके प्रत्येक कार्य में कोई न कोई रहस्य छिपा होता है, जिसे वे स्वयं ही जानते हैं, साधारण जीव उन रहस्यों को क्योंकर जान सकते हैं? श्री गुरुमहाराज जी ने किले में जाना स्वीकार कर लिया।ग्वालियर के किले में उनदिनों बावन राजा कैद थे,जिन्हें अकबर ने किले में नज़रबन्द किया थाऔर जो अब तक वहीं कैद थे।वे जीवन से पूरी तरह निराश हो चुके थे और दुःखों चिंताओं में घुल-घुल कर उनके शरीर अस्थिपिंजर मात्र रह गये थे।श्रीगुरुमहाराज जी के किले में पदार्पण करते ही वहां सतसंग की पवित्र-निर्मल धारा प्रवाहित होने लगी।महापुरुषों के पावन दर्शन कर के तथा उनके कल्याणकारी वचनों को श्रवण करके मुर्दा शरीरों में फिर से जान पड़ गई।उनकी सब चिंतायें,दुःख तथा कष्ट काफूर हो गये। वही किला जो पहले उनके लिये बन्दीगृह था,महापुरुषों के वहां चरण डालते ही अब बैकुण्ठ से भी अधिक सुखदायी बन गया। सभी गुरुमहाराज जी के सेवक बन गये और उनके दर्शन एवं सतसंग के अमृत पान करने के साथ-साथ उनके वचनानुसार नाम का सुमिरण करने लगे। इसी प्रकार कई महीने बीत गये।
     इधर बादशाह जहांगीर को वास्तव में ही रोगों ने घेर लिया और धीरे-धीरे उसका स्वास्थ्य बहुत गिर गया। तब लाहौर के सूफी फकीर मियांमीर ने दिल्ली आकर बादशाह को समझाया कि यह सारा कष्ट तुम्हारे ऊपर इसलिये आया है, क्योंकि तुमने दुष्ट लोगों के बहकावे में आकर गुरु हरिगोबिंद साहिब को, जो कि पूर्ण महापुरुष हैं, ग्वालियर के किले में नज़रबन्द कर दिया।आज इस बात को कई महीने हो गये।
     यदि भलाई चाहते हो, तो उन्हें तत्काल सम्मानपूर्वक रिहा कर दो। जब बादशाह ने गुरुमहाराज जी की रिहाई का सन्देश भेजा,तो गुरु महाराज जी ने उत्तर में बादशाह को कहलवा भेजा कि हमारे साथ इन सब राजाओं को भी स्वतन्त्र करो तो ठीक अन्यथा हम भी इस किले से बाहर नहीं जायेंगे। तब बादशाह ने दोबारा सन्देश भिजवाया कि जितने राजा आपके चोले को पकड़ लेंगे,वे सब आपके साथ बाहर जा सकेंगे। तब गुरुमहाराजजी ने बावन कलियों वाला चोला बनवाकर पहन लिया। प्रत्येक राजा ने एक एक कली पकड़ ली और गुरुमहाराज जी की कृपा से कैद से मुक्ति प्राप्त की।
     महापुरुष तो संसार मेंअवतरित ही इसीलिये होते हैं ताकि वे जीवों को दुःखों, कष्टों तथा चिंताओं की ज्वाला से निकाल कर,चौरासी की कैद से छुड़ाकर,उन्हें सुख एवं आनन्द प्रदान करें और उन्हें हर प्रकार के बन्धन से मुक्ति दिलायें।इसलिये यदि सुख और आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करते हुये जीवन का सच्चा लाभ प्राप्त करने की इच्छा है, तो फिर सच्चे सेवक बनो। मनमति का त्याग कर सद्गुरु की आज्ञा अथवा वचन को दृढ़तापूर्वक पकड़ लो,श्री आज्ञा को श्रद्धापूर्वक ह्मदयंगम कर ह्मदय से उसकी पालना करो। इसी में जीवन का सच्चा लाभ और परम कल्याण है।                 

Friday, February 5, 2016

नेक कमाई ही फलती फूलती है।


संसार में रहते हुए सच्चाई, सदाचार तथा संतोष पूर्वक जीवन यापन करने का उपदेश देते हुए श्री परमहँस दयाल जी ने एक बार वचन फरमाये कि नेक कमाई बहुत फूलती फलती है।
     एक कथा है कि मारवाड़ के किसी गाँव में एक पठान और एक ब्रााहृण आपस में बड़े मित्र थे।खर्च आदि की तंगी से दुःखी होकर दोनों ही रोज़गार की खोज में दिल्ली चले आये।पठान ने तो शाही बावर्चीखाने
में नौकरी कर ली जहाँ वेतन के अतिरिक्त नाना-प्रकार के स्वादिष्ट खाने मिलते थे।इसके अतिरिक्त ऊपरीआमदनी भी काफी थी।अतः थोड़े समय में ही वह खूब ह्मष्ट-पुष्ट और धनवान हो गया। ब्रााहृण बेचारा किसी वज़ीर के यहाँ खाना पकाने पर मुलाज़िम हो गया। वज़ीर साहिब कुछ दस्तकारी करते थे और उससे जो कुछ पैदा होता, उसी से उनकी रसोई का खर्च चलता था। केवल एक प्रकार की दाल और रोटी ही उनकी रसोई में पकती थी। ब्रााहृण को वेतन भी हर महीने नहीं मिल पाता था तथा भोजन भी पौष्टिक नहीं था अतः वह कमज़ोर हो गया।
     जब दोनों मित्र आपस में मिलते तो पठान उस ब्रााहृण से मज़ाक करता कि तुमने कैसे कंजूस के यहाँ नौकरी की है। यह सुनकर ब्रााहृण चुप रहता। मन ही मन वह ऐसी शान्ति और सन्तोष अनुभव करता कि उसे कभीअधिक धन कमाने का लालच पैदा ही नहीं हुआ।पठान ने जब खूब धन एकत्र कर लिया तो वहां से अवकाश लेकरअपने घर जाने का विचार किया।यात्रा की तिथि निश्चित करके ब्रााहृण से भी पूछा कि यदि तुम्हारा विचार हो तो मेरे साथ चलो। ब्रााहृण ने वज़ीर साहिब से विदा मांगी परन्तु उन्होंने स्वीकार न किया।जब चलने का दिनआया तोब्रााहृण ने विनय की,""हुज़ूर! मेरा एक मित्र घर जा रहा है। यदि आज्ञा हो तो बच्चों के लिए कुछ भेज दूँ?''वज़ीर साहिब ने जेब में हाथ डाला।संयोग से उस समय केवल दो पैसे उनकी जेब में थे। वे उन्होने निकाल कर ब्रााहृण को दे दिये। गरीब ब्रााहृण बड़े आदमी से क्या कह सकता था। कहर दरवेश बर जान दरवेश। खामोश हो गया,सोचा कि मित्र से जाकर मिल तो लें। बाज़ार से गुज़र रहा था कि अनार बिकते हुये दिखाई पड़े।
सोचा कि मारवाड़ में अनार बिल्कुल नहीं होते, यही भेज देने चाहियें। दो पैसों में दस बारह अनार मिल गये। वह ले जाकर उसने अपने मित्र को दे दिये और सारा वृत्तान्त सुना दिया।
     पठान यात्रा करते करते जब मारवाड़ पहुँचा तो किसी बड़े शहर में रात्रि को ठहरा।वहाँ सराय में चोरों ने उसका सारा धन-माल चुरा लिया। अनार कपड़े में बँधे हुये खूँटी पर टँगे थे,उनपर किसी की दृष्टि न पड़ी। बेचारा सुबह उठा तो अपना धन-माल न पाकर अत्यन्त दुःखी हुआ कि अब क्या करे और किस प्रकार घर पहुँचे?संयोग की बात कि उस शहर में जो बड़ा साहुकार था, उसका इकलौता लड़का बहुत सख्त बीमार था और किसी भयानक रोग से पीड़ित था।हकीम ने बताया किअगर इसको अनार के दाने तत्काल खिलाये जायें तो इसके जीवन की आशा है। ढिंढोरा पिटवा दिया गया कि कोई अनार लाकर देगा, उसको बहुत धन दिया जायेगा। पठान ने इस अवसर को गनीमत समझा और तुरन्त वे अनार ले जाकर सेठ को दे दिये। जब वहअनार उस लड़के को खिलाये गए तो मालिक की कृपा से वहस्वस्थ हो गया।उस साहुकार ने बहुत सा धन उन अनारों के बदले में दिया। उन रुपयों में से खर्च करते हुए वह पठान अपने घर पहुँचा।जितना धन शेष बचा था,वह सब ब्रााहृण के घर वालों को दे दिया। मार्ग की कठिनाइयों व धन प्राप्ति का सब हाल लिख कर ब्रााहृण के पास भी भेज दियाऔर यह भी लिख दिया किअब तुमको नौकरी करने की आवश्यकता नहीं है। पर्याप्त धन मिल गया है, घर वापिस चले आओ।उस ब्रााहृण ने सारी बात वज़ीर महोदय को बतला कर विनती कि कि ये  दो पैसे आपने कैसे  दिये थे  कि जिनके  बदले
इतना धन प्राप्त हो गया।वज़ीर ने उत्तर दिया कि मैं शाहीकोष को अपने निजी खर्च में बिल्कुल नहीं लाता। अपनी दस्तकारी और परिश्रम की कमाई से जो पैसा बनता है,उसीसे काम चलता हूँ।तुमने बहुत ईमानदारी से काम किया था, इसलिए मैं नहीं चाहता था कि शाही कोष से तुमको वेतन दिया जाये। सो मैने अपनी मेहनत की कमाई में से ही दो पैसे दे दिये थे। परन्तु मैं इस बात को भी जानता था कि वे दो पैसे तुम्हारे पूरे जीवन के लिए पर्याप्त होंगे।अब यदि तुम घर जाना चाहो तो बड़ी प्रसन्नता से जा सकते हो। ब्रााहृण उनसे विदा लेकर जब घर आया तो पठान ने उन रुपयों के लिए जो यात्रा में उसने खर्च किये थे,क्षमा मांगी। ब्रााहृण ने कहा कि जो कुछरूपया तुम वसूल करके लाए हो,उसमें से तुमआधे भाग का अधिकार रखते हो, क्योंकि यदि तुम किसी प्रकार की ख्यानत करते तो मुझे क्या मालूम हो सकता था?वास्तव में उन दो पैसों में से जो मेरे वेतन में मुझे मिले है,केवल एक पैसा ही मेरीआयु के लिए काफी होगा।शेष एक पैसा तुम अपने काम में लाओ।इस प्रकार उन नेक कमाई से उन दोनों ने ही लाभ उठाया।

तीन प्रकार की प्रार्थनाएं करने वाले


कजानजाकिस ने अपनी एक किताब में लिखा है, कि मैने  तीन तरह के लोग देखे और तीन तरह की प्रार्थनायें करते देखे।पहले तरह के लोग हैं, वे कहते हैं, ""परमात्मा!हम धनुष हैं,तू हमारी प्रत्यंचा पर तीर को चढ़ा। कहीं ऐसा न हो,कि तू तीर को चढ़ाये ही न,प्रत्यंचा को खींचे ही न और हम जंग खाकर ऐसे ही समाप्त हो जाएं। दूसरे हैं,और दूसरी तरह के प्रार्थना करने वाले लोग,वे कहते हैं,तू प्रत्यंचा पर तीर को चढ़ा, हम तेरे धनुष हैं परमात्मा, लेकिन ज़रा ख्याल से चढ़ाना। कहीं ज्यादा मत खींच देना, कहीं ऐसा न हो,कि प्रत्यंचा टूट ही जाये।और तीसरी तरह के लोग हैं और तीसरी तरह की प्रार्थना करने वाले, वे कहते हैं, हे परमात्मा!हम तेरे धनुष हैं,तू अपने तीरों को हमारी प्रत्यंचाओं पर चढ़ा और फिक्र मत करना, कम ज्यादा का हिसाब मत रखना, तेरे हाथ में टूट भी गये, तो इससे बड़ा कुछ और होना नहीं है।यह जो तीसरी तरह का व्यक्ति है,यही उपलब्ध कर पायेगा। पहली तरह का व्यक्ति कहता है, कहीं हम ऐसे ही न चले जाये, उसकी नज़र अपने पर ही लगी है अभी कहीं ऐसा न हो,
कि जंग खा जायें बिना किसी सफलता के स्वर्ग को जाने, ऐसे ही न खो जायें।हमें तू सफल बना।लेकिन न तो परमात्मा से सम्बन्ध हैप्रार्थना का, न साहस है प्रार्थना का। डर है कि कहीं जंग न खा जायें और डर है कि कहीं असफल न मर जायें लोभ की आकाँक्षा है, लोभ की प्रार्थना है।
     दूसरी तरह के लोग है, ज्यादा चालाक हैं,होशियार है। परमात्मा के साथ भी सौदा करना चाहते हैं,वहां भी अपना गणित लेकर आते हैं।वहाँ भी हिसाब-किताब रखते हैं। दुकानदार हैं। ऐसे व्यक्ति भी परमात्मा के निकट नहीं पहुँच सकते। ऐसे व्यक्ति भी परमात्मा को भी पूरी स्वतंत्रता नहीं दे रहे हैं। उसको भी नियंत्रण में रख रहे हैं। उसको भी बाँधकर चलाना चाहते हैं। परमात्मा को अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं, परमात्मा के हिसाब से स्वयं नहीं चलना चाहते।और जब तक तुम परमात्मा के साथ चलने को राज़ी नहीं हो,तब तक तुम उसे उपलब्ध न कर सकोगे। जब तक तुम चाहते हो वह तुम्हारे पीछे चले, तब तक तुम्हारा सम्बन्ध ही न जुड़ पायगा।
     तीसरी तरह के लोग है, तुम तीसरी तरह के लोग बनना। प्यारी है उनकी प्रार्थना और बड़ी महत्वपूर्ण, कि हम तेरे धनुष हैं। हम तेरे साधन है,उपकरण हैं। तू अपने तीरों को चढ़ा। हमारे लक्ष्यों को भेदने की नहीं, तेरे ही लक्ष्यों को भेदने के लिए। हम तो केवल धनुष हैं। तू अपने तीरों को चढ़ा और अपने लक्ष्यों के भेद और इसकी फिक्र ही मत करना, कि हम बचें के टूटें। तेरे हाथ में टूट ही गये तो इससे बड़ा और क्या होना हो सकता है। ये समर्पित हैं। इनकी प्रार्थना में न तो भय है, न लोभ है। इनकी प्रार्थना में तो सिर्फ एक प्रार्थना है और वह प्रार्थना यह है, कि तू
हमें अपना उपकरण बना ले। उस उपकरण बनने में हम मिट जायें, तो हमारा सौभाग्य है।इसलिए यह जानते हुए भी किअपनी कोई पात्रता नहीं है, फिर भी तुम जाना। अगर यह सब जानते हुए तुम गये और विनम्रता से गये और परमात्मा के उपकरण बनने की आकाँक्षा से गये,तो तुम्हारी पात्रता तुम्हें मिल गई। तुम खाली हो, यही तुम्हारी पात्रता है।ऐसी पात्रता वाला ही श्रद्धावान हो सकता है। वह सभी अवस्थाओं में सम रहता है। वह कहता है कि  जन्म जैसे उसने दिया था, मृत्यु भी उसी ने दी। जब जन्म में भी उसी का हाथ था, तो मृत्यु में भी उसी का हाथ है। जब उस का हाथ है,तो सब ठीक है।फिर शिकायत कहाँ?वह कहता है कि हमारी क्या ज़रूरत, तू कर ही रहा है। तू सदा ठीक ही कर रहा है।और हमारे सोचने-विचारने से कुछ बदलता भी तो नहीं। जो होता है, हो होना है,हो रहा है,सब ठीक मेरे बीच में खड़े होने की ज़रूरत ही क्या है। इसी का नाम विनम्रता है, निरहंकारिता है। ऐसा ही व्यक्ति उस को पा लेता है।

Thursday, February 4, 2016

महात्मा जी को खाने में प्याज खिलाये


     किसी राजा के दरबार में एक फकीर यह सदा किया करता था कि ""नेकों के साथ नेकी करोऔर बदों की बदी स्वयं उनको नष्टकर देगी'' एक दरबारी इस सदा से अत्यन्त अप्रसन्न हुआ करता था। उसने राजा से चुगली की कि हुज़ूर! अमुक फकीर ऐसा कहा करता है कि राजा के मुख से दुर्गन्ध आती है। राजा ने कहा-उसको हमारे सामने लाओ, हम इसकी जांच-पड़ताल करेंगे। चुगलखोर ने फकीर को कहला भेजा कि राजा की ओर से आप की दावत है और उस दिन भोजन में बहुत से प्याज़ पकवा कर उस फकीर को खिलाये, तत्पश्चात्  राजा  के समक्ष उपस्थित किया जब फकीर राजा के सम्मुख गया तो उसको विचार हुआ कि कहीं प्याज़ की दुर्गन्ध राजा को अप्रिय न लगे, इसलिये सामने जाकर मुख पर हाथ धर लिया।
     चुगलखोर ने उसी समय राजा को संकेत में कहा कि हज़रत! देखिये इसने आपके मुख की दुर्गन्ध से बचने के लियेअपने मुख पर हाथ धर लिया है। राजा ने फकीर से तो कुछ न कहा, एक पत्र अपने नगर कोतवाल के नाम लिखकर फकीर को दिया और कहा कि इसको कोतवाल के पास ले जाओ। उस राजा की यह नीति थी कि जिस किसी को विशेष पुरस्कार देता था, उसको नगर कोतवाल के नाम पत्र लिख कर दिया करता था।उस चुगलखोर ने समझा कि अवश्य ही इस फकीर को भी कोई विशेष पुरस्कार मिला है। शीघ्रतापूर्वक बाहर निकल कर फकीर के पीछे हो लिया और विनय की कि हज़रत!यह पत्र यदि आप मुझे दे दें तो मैं कोतवाल को पहुँचा दूँ, आप व्यर्थ कष्ट क्यों करते हैं। फकीर ने वह पत्र उसी को सौंप दिया। वह पत्र लेकर कोतवाल के पास पहुँचा।उसमे लिखा हुआ था कि पत्रवाहक को बिना देर किये कत्ल करा देना और उसकी खाल में भुस भरवा कर हमारे पास भिजवा देना, यदि देर हुई तो पूछताछ होगी। कोतवाल ने पत्र पढ़कर जल्लाद को आदेश दिया कि इस व्यक्ति को तत्काल कत्ल कर दो।चुगलखोर ने बहुतबावेला मचाया और फरियाद की और कहा कि ज़रा तुम राजा से तो पूछ लो, किन्तु कोतवाल ने पूछताछ के भय से उसकी एक न सुनी और तत्काल उसको कत्ल करा दिया। फिर उसकी खाल में भुस भरवा कर राजा के पास भेज दी।जब राजा को यह ज्ञात हुआ तो फकीर को बुलवाकर सब वृतान्त पूछा कि तुमने हमारे विषय में यह कहा था कि राजा के मुख से दुर्गन्ध आती है? फकीर ने इनकार किया और कहा कि मैं तो सदैव यही सदा किया करता हूँ कि नेकों के साथ नेकी करो और बदों की बदी स्वयं उनको नष्ट कर देगी। मालूम नहीं उसने क्या समझा।
     तब राजा ने फिर पूछा कि तुमने हमारे सामने आते समय मुख पर हाथ क्यों रखा था?फकीर ने उत्तर दिया-उस दिन भोजन में बहुतअधिक प्याज़ सम्मिलित थी,उसकी गन्ध आपको अप्रिय न लगे, इसलिये मैने अपने मुख पर हाथ धर लिया था। फिर पत्र के विषय में पूछा तो फकीर ने कह दिया कि मार्ग में उस व्यक्ति ने (जिसने मुझे प्याज़ खिलाये थे) पत्र मुझसे ले लिया था कि मैं स्वयं ले जाऊँगा। उस समय राजा को फकीर की सत्यता प्रकट हुई और उससे कहा कि आप यह सदा प्रायः किया करें कि""नेकों के साथ नेकी करो और बदों की बदी स्वयं उन्हें नष्ट कर देगी।'' जैसा कि आज की घटना से सिद्ध हो गया है कि उस चुगलखोर ने वास्तव में ही अपनी बदी का दंड स्वयं अपने हाथों पाया।

Wednesday, February 3, 2016

दो मुमुक्षु मुक्त होने के इच्छुक


     किसी महात्मा के पास दो व्यक्तियों ने जाकर विनय की कि महाराज! हमको मुक्त कर दीजिए। और इसी इच्छा को लिये बहुत दिनों तक महात्मा जी के पास जाते रहे, परन्तु महात्मा जी ने उनकी तरफ रुख न किया। एक दिन वे दोनों व्यक्ति किसी गांव से रुपया उगाह कर ला रहे थे कि मार्ग में महात्मा जी के आश्रम पर ठहर गये। महात्मा जी उचित अवसर जान कर एक बड़ा काबुली छुरा अन्दर से निकाल लाये और उनसे पूछा कि क्यों भाई! एक मुक्त होगा अथवा तुम दोनों ही मुक्त होंगे? और यह कहकर पत्थर पर छुरा तेज़ करने लगे। यह देखकर एक तो भयभीत हो गया और उसने सोचा कि महात्मा जी के मन में कुछ पाप आ गया है, इसलिये अपनी थैली उठाकर चुपके से खिसक गया। किन्तु दूसरा बैठा रहा। जब महात्मा जी छुरा तेज़ कर चुके तो पीछे घूम कर देखा कि एक तो भाग निकला है। दूसरे से कहा कि भाई! भला चाहता है तो तू भी जान बचा कर भाग जा, वरना व्यर्थ में मारा जायेगा तो लोगों को इसी प्रकार मुक्त करता हूँ। उसने हाथ जोड़कर विनय की-महाराज! यदि आप इसी प्रकार मुक्त करते हैं तो मुझको शीघ्र मुक्त कर दीजिये, क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि आपका विचार बदल जाये और मैं मुक्त होने से रह जाऊं। महात्मा जी समझ गये कि यह दृढ़ विश्वासी है, नहीं टलेगा। छुरे को तो धर दिया और उसको परमार्थ के भेद समझा कर और अपनी कृपा-दृष्टि डाल कर निहाल कर दिया। ""नानक नदरीं नदरि निहाल'' सन्त सत्पुरुषों ने सत्य कहा हैः-
          यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
          सीस दिये जो गुरु मिलें, तौ भी सस्ता जान।।
          जां बजानां बिदह वगरना अज़ तो बिस्तानद अजल।।
          खुद तू मुन्सिफ बाश ऐ दिल! र्इं निको यां आँ निको।।
अर्थः- अपना जीवन अपने मालिक को समर्पित कर दे अर्थात् उनके नाम पर अर्पण कर दे, वरना मृत्यु का देवता तुझ से छीन कर ले जायेगा। फकीर कहते हैं कि ऐ मन! अब तू स्वयं ही न्यायाधीश बनकर न्याय कर कि यह ठीक है कि तू अपना जीवन अपने हाथों अपने मालिक को सौंप दे अथवा वह ठीक है कि तुझ से तेरे प्राणों को काल बलपूर्वक छीन कर ले जाये।

Monday, February 1, 2016

एक भाई दूध में पानी मिलाता था


    एक दिन श्री वचन हुये कि किसी नगर में दो ब्रााहृण सगे भाई रहते थे।पिता की मृत्यु के पश्चात छोटे बाई ने चतुराई से सारी सम्पत्ति अपने अधिकार में रख लीऔर बड़े भाई को यूं ही कुछ थोड़ा बहुत देकर टाल दिया। बड़ा भाई नेक और ईमानदार था। उसने थोड़ी सी पूँजी से कुछ कारोबार प्रारम्भ कर दिया और जो दो-चार आना प्रतिदिन उस पूँजी से
पैदा करता, उसी से ही अपनी गृहस्थी का पालन करता था। कुछ समय पश्चात छोटा भाई उसके पास आया और कहने लगा कि मैने पिता की सारी कमाई उड़ा दी है। अब मेरे पास कुछ नहीं रहा,यहाँ तक कि भूखे मरने की स्थिति आ गई है। यदि तुम से कुछ हो सके तो मेरी सहायता करो। उसने उत्तर दिया कि मैं दो-चार आने नित्यप्रति कमाता हूँ, उससे बड़ी कठिनता से दिन कटते हैं। खैर,एक रूपया ले जा। गाँव से दूध लाकर बेचा कर। दो-तीन आने प्रतिदिन बच ही जाया करेंगे, उसी से निर्वाह करना। किन्तु सावधान! बेईमानी न करना। छोटे भाई ने रुपया ले लिया और गाँव से दूध लाकर बेचना आरम्भ किया।
    एक दिन उसके मन में पाप समायाऔर उसने दूध में पानी मिलाकर बेचना प्रारम्भ किया, यहां तक कि कुछ दिनों में बहुत धन कमाया और बहुत बड़ी दुकान खोल ली।उसमें भी कपट का व्यापार ज़ारी रखा। उस के बड़े भाई ने उसको बहुत मना किया,परन्तु वह अपने दुश्कर्म से न रुका। एक दिन बड़े भाई ने एक फकीर से कहा कि महाराज!इस संसार में बेईमान सदैव सुखीऔर धनवान होते हैंऔर ईमानदार दुःख और कष्ट में घिरे रहते हैं,इसका क्या कारण है?यह कहकर उसनेअपनाऔर अपने भाई का सब हाल बतलाया और यह भी कहा कि वह प्रायः ऐसा कहा करता हैः- ऐ ख्यानत बर तू रहमत अज़ तू गंजेयाफ्तम।।
          ऐ दयानत बर तू लानत अज़ तू रंजेयाफ्तम।।
अर्थः-ऐ बेईमानी तू फले-फूले कि तुझसे मैने खज़ाना पा लिया है। ऐ ईमानदारी तेरा नाश हो कि तुझ से मैने दुःख और कष्ट ही पाया है। फकीर ने पूछा कि वह क्या बेईमानी करता है? उसने उत्तर दिया कि
दूध में पानी मिला कर बेचता है। साधू ने पूछा कि क्या तू बता सकता है कि उसने कितने लोटे पानी अब तक दूध में मिला कर बेचा है?उसने हिसाब लगा कर गिनती बतला दी,क्योंकि वह नित्यप्रति उसको मिलाते देखता और गिनती करता रहा था।साधू ने कहा कि एक मनुष्य के कद के बराबर गढ़ा खोदो और उतने ही लोटे मापकर पानी के उसमें डाल दो।जब उसने गढ़ा खोदकर पानी भर दिया तो फकीर नेआदेश दिया कि ज़रा तू इसमें उतर कर खड़ा हो जा। जब वह गढ़े में उतरा तो उसकी गर्दन तक पानी आया। तब साधू ने उससे कहा कि अभी पानी की मात्रा उसके डूबने के लिये काफी नहीं है। जब उतने लोटे पानी और मिला लेगा, तब नष्ट हो जायेगा।और उसकी यह सम्पत्ति उसकी बेईमानी का फल नहीं अपितु उसके पूर्व जन्म के शुभ संस्कारों का फल है। किन्तु खेद! कि वह बेईमान उसको भी नष्ट कर रहा है। यदि वह बेईमानी न करता और ईमानदारी से व्यापार करता,तब भी उसे इतना धन तो समय पर मिल ही जाताऔर उसके कुछ काम भी आता,परन्तुअब तो बेईमानी करने के कारण उसकी सब सम्पत्ति नष्ट हो जायेगी।अब भी यदिसन्मार्ग पर आ जाये तो उसका बचाव हो सकता है, परन्तु उसके सिर पर तो पाप का भूत सवार है।
     वह फकीर से मिल कर घर चला आया। उसने भाई को बेईमानी करने से बहुत मनाकिया,परन्तु उसने एक न मानी बड़ा भाई दिन गिनता रहा।जब पानी के लोटों की गिनती पूरी हो गई, तो शाम के समय छोटा भाई दूध के नीचेआग बुझाकरऔर उन बुझी हुई लकड़ियों को लकड़ियों के ढेर में फेंक कर सो रहा।एक लकड़ी में संयोग सेआग लगी रह गई।
वही सुलग कर पूरा ढेर में लग गई और दुकान आदि सब जलने लगीं। वह नींद से चौंक कर उठा।अड़ोस-पड़ोस के लोग आग बुझाने को दौड़े, परन्तु व्यर्थ।जो कुछ सामान आदि था,सब जलकर राख हो गया। उसकी अंटी में केवल एक रुपया बँधा था,वही उसके पास बचा।यह वही रुपया था जो उसके बड़े भाई ने अपनी ईमानदारी की कमाई में से दिया था। सत्य है ईमानदारी की कमाई कभी व्यर्थ नही जाती।

धीरे चले तो जल्दी पहुँचोगे


     दौड़ने वाले पीछे रह जाते हैं,और जो सहज चलते हैं वे बहुत आगे निकल जाते हैं।कोरिया में एक वृद्ध भिक्षु एक नदी पार कर रहा है।और उसके साथ एक युवा भिक्षु भी है। नदी के पार पहुँचकर जैसे ही नाव बांधी है मांझी ने, तो उन्होने उस बूढ़े से पूछा है कि गांव कितना दूर है, क्योंकि हमने सुना है कि सूरज ढलते ही गांव का द्वार बन्द हो जायेगा। और सूरज ढल रहा है। कितना दूर है?हम पहुँच पायेंगे कि नहीं? मांझी ने नाव बांधते हुए कहा कि धीरे गये तो पहुंच भी सकते हैं। अब ऐसे पागल की बात कौन सुने। उन्होने सोचा कि यह पागल है। इसकी बात में पड़े तो गये। क्योंकि कहता है कि धीरे गये, तो पहुँच भी जाओगे।
     वे भागे। फिर उन्होने पूछा भी नहीं। सांझ हो रही है। सूरज ढला जा रहा है। वे तेज़ी से भाग रहे हैं, क्योंकि द्वार बन्द हो गया, तो जंगल में रह जाना पड़ेगा। पहाड़ी रास्ता है।फिर सूरज एकदम ढलने के करीब हो गया है, वे और तेज़ी से भागे। फिर वह बूढ़ा गिर गया। उसके घुटने टूट गये और लहू बह गया और उसकी किताबों के पन्ने बिखर गये, जो वह सिर पर लिये था। फिर वह मांझी पीछे से गीत गाता हुआ आ रहा है। वह पास आकर खड़ा हो जाता है। उसने कहा, मैने कहा था, क्योंकि मेरा बहुत दिन का अनुभव है। रोज ही सांझ यहां कोई उतरता है,और रोज़ ही कोई मुझसे पूछता है कि कितनी दूर है? पहुँच जायेंगे न सूरज ढलते? तो मेरा निरंतर का अनुभव यह है कि जो धीरे जाते हैं, वे पहुँच भी जाते हैं। रास्ता बहुत बीहड़ है। जो तेज़ी से जाते हैं,अक्सर गिर जाते हैं। लेकिन मेरी बात उस वक्त ठीक नहीं लगती, क्योंकि उन्हें यह लगता है कि धीरे गये,तो कैसे पहुँचेंगे। क्योंकि हमारा पहुँचने का ख्याल ही तेज़ जाने वाले से जुड़ा हुआहै।लेकिन कुछ मुकाम ऐसे भी हैं जहां धीरे जाने से पहुँचते हैं।और कुछ मुकाम ऐसे हैं,जहां जाने से कभीपहुँचते ही नहीं। न जाने से पहुँच जाते हैं। पर उन मुकामों का हमें कोई पता नहीं है।
     सक्रियता जो है, वह आपकी चेष्टा नहीं है।सक्रियता आपके भीतर शक्ति का सहज प्रगटन है,आपकी चेष्टा नहीं है।आप अपनी चेष्टा से सक्रिय नहीं हैं।और अगर आप बिल्कुल सहज हो जाते हैं, तो आपके भीतर की जो शक्ति है, वह आपको सक्रिय रखेगी।लेकिन वह सक्रिय
होना उतना ही होगा, जितनी शक्ति होगी, उससे ज्यादा कभी नहीं होगी। इसलिए रिएक्शन की निष्क्रियता कभी भी नहीं आयेगी और कभी थेकेंगे नहीं, क्योंकि थकने के पहले शक्ति वापस लौट जायेगी।